योगदानकर्ता

31 जुलाई 2012


कल मैंने बाजार से खरीदी ५ राखिया ,२४ धागे , जब
दुकान दार भी हसने लगा क्या पूरे मोहल्ले के भाई बना लिए अपने
कितने पैसे कमा लेती हो?राखी के ही एक रोज में !!!गुस्सा तो इतना आया गुस्सा तो इतना आया के पूछु के क्या तुम अपनी बेटी को बहन को पैसे देते हो तो गल्ले में कुछ कम हो गया सोचते हो . क्या पैसे सगी बहन चचेरी मौसेरी बहन का भेद जानते है .क्या पैसे मिलना जरुरी है राखी पर भाई बहन के सर पर हाथ रख रख देता है तो बहन को सब मिल जाता है . बहन जब भाई को एक टिका लगाती है माथे पर भाई की किस्मत उचे मुकाम को चूमे बस यही दुआ करती है

मेरी अपनी बेटी नही पर मेरे बेटो की कलाई कभी सूनी नही रही हाथ भर राखी पहनते है दोनों .मामा मौसी की चाचा की बेटी उनको राखी भेजती है ...
राखी क्या सिर्फ सगे भाई की कलाई जानती है
हमने बचपन से अपने भाई के साथ,चाचा मौसी के बेटो को भाई माना है
हर सुख दुःख में उनको अपने साथ माना है आज भी अगर में जरा भी परेशान होती हु .सब भाई मेरे साथ होते है
मेरी माँ ने कभी फर्क नही सिखाया के यह सगा भाई है यह चाचा का बेटा
यह मासी का , आज ब्बच्चो को देखती हु के उदास हो जाते है के हमारी बहन नही है या भाई नही है
यहाँ कमी है उनके परेंट्स की . जो उन्होंने अपने बच्चो को रिश्तो की आह्मियत नही सिखाई आज चाचा का घर एक अलग एकै बन गया है पर त्यौहार पर क्यों नही उसकी बेटी को राखी पर बुलाया जाता है .शायद भोतिकता इतनी हावी हो गयी है के हम हल्दीराम में जाकर १००० का खाना खा कर आयेंगे पर चाचा के बेटी को कोण हर साल राखी का नेग दे. हम बच्चो को खुद ही नेतिक स्टार पर खोखला बना रहे है . छोटे परिवार है आजकल तो हर घर मई भाई या बहन हो जरुरी नही है इसलिए क्या हम अपने बेटो की कलाई पर उनकी उन बहनों से राखी क्यों नही बंधवाते है जिनका कोई भाई नही है ........देखिएगा आपके बच्चे कितनी प्यारी सी मुस्कान से दुनियादारी सिख जायेगे . जिन्दगी में व्यवहारिक होना जरुरी है पर रिश्तो को जिंदा रखने में पहल माँ को करनी होगी .... उम्मीद करती हु इस साल उन बहनों को भाई मिले एवेम उन भाइयो को बहन जिनकी सगी बहन नही है ...क्युकी रिश्ते दिल से होते है सिर्फ खून से ही नही तभी हमारे समाज में कुछ असमानता कम हो पायेगी , सभ्यता एवेम संस्कृति बनी रहेगी