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10 मई 2014

बाबल अस्सा उड़ जाना

"साडा चिड़िया डा चंबा वे बाबल अस्सा उड़ जाना ".. गीत की धुन बज रही थी मस्तिष्क में और रमेश की आँखों से अविरल आन्स्सुओ की धारा बह रही थी , क्यों भेज दिया उसने परदेस अपनी चिड़िया सी बेटी को ब्याह कर ,जहाँ उसे एक दिन भी पत्नी का सुख न मिला बस एक नौकरानी बनी अपने पति और उसकी गोरी पत्नी की सेवा करती रही , परसों रात उसका फ़ोन आया था कि पापा अब थक गयी हूँ मुझे ले जाओ आकर , बेटी की करुण पुकार सुन कर तुरत फुरत में टिकेट ली और पहुँच गये फ्लोरिडा . बेटिया पिटा की धड़कन होती हैं उनके हंसने रोने से हार्ट बीट बढतीकम होती हैं बेटी की विदाई पर उसके ससुराल के सामने हाथ जोड़कर खड़ा रहने वाला पिता सामने बेटी की मृत देह देख कृन्दन कर उठा . अब के बरस भैया को भेज दे ओ बाबुल गाती बिटिया के शब्दों का दर्द क्यों नही पहचान पाए .जा बेटी घर आपने कहकर क्यों उसको पराया कर दिया आज पिता रो रहे हैं जार जार .......बेटी को पराया धन समझ कर ...उसको भी तो अपने खून से सींचा था उसको भी माँ ने ९ माह ही गर्भ में रखा था तो आज बेटियाँ चिड़िया जैसी क्यों और बेटे शेर जैसे क्यों ?आज पिता का दिल समझ पा रहा था गाने के बोल के अर्थ . "साडी वड्डी उड्दारी वे अस्सी तेरे वेढ़े नही आणा"
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