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24 जुलाई 2014

..सात्वना के दो लफ्ज़ ..........

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"तुम थी न वहां !! तुम थी वहां !! मैं जानती हूँ , जब उन्होंने मुझसे कहा था आपके ही घर में कि तुझे अकेला कभी नही छोडूंगा , आज तुम सबके साथ मिलकर कहती हो वोह चले गये ! हमेशा हमेशा के लिय !! " 
"दीदी प्लीज तुम तो ऐसा न कहो ना वोह कैसे जा सकते हैं मुझे छोड़कर , मैंने इन्ही हाथो में उनका हाथ दिन रात थामा रखा था कभी अकेला नही छोड़ा पिछले डेढ़ बरस से , आज मेरा हाथ खाली कैसे हो सकता हैं "
"दीदी मैं तो उनका हाथ थाम कर इस घर मैं आई थी अब इस घर में अकेली कैसे रह पाऊंगी , वोह नही जा सकते मुझे अकेला छोड़ कर "
ऋतू को गले लगाये रोती दीदी क्या कहे कैसे सम्हाले उसके खुद के हाथ से भी तो राखी छूट गयी थी , मायके ना आने पर प्यार से धमकाते लफ्ज़ रूठ गये थे , गोभी की सब्जी के लिय जिद और मनुहार रूठ गयी थी , उसके माँ- बाप को कन्धा देने वाले चार कंधो में से एक कन्धा खुद चारकंधो पर सवार होकर चला गया था . अब कहाँ से लाये यह लफ्जों की धनी माने जाने वाली दीदी ......

..सात्वना के दो लफ्ज़ ...........
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