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11 अप्रैल 2014

संस्कार और रिश्तो को निभाने की काबिलियत

"उफ़ ! कितना काम हैं , मैं तो जैसे नौकरानी बन जाने के लिय आई हूँ इस घर में , हर कोई आता हैं हुक़म देकर चला जाता हैं यह बना दो , वोह बना दो "
मीनू घर भर को समेट'ते हुए खुद से बडबडा रही थी | कल ननद जी आरही हैं अपने बेटे के लिय लड़की देखने के लिय , अब मायके में मीन मेख निकालना तो बनता हैं उनका ,
घर को साफ करके उसने ननद की नजर से घर को देखने की कोशिश की और खुद को कहा " माँ ज्यादा घर साफ़ रखती थी ना भाभी , और खुद से खुद मुस्कुराती हुयी नहाने चल दी
पूरा घर गुलज़ार हो उठा था चहक से , बेटिया कितनी भी उम्र की हो जाए मायके में उनकी आवाज़ चहकती सी लगती हैं , लड़की वाले मिलने के लिय आ चुके थे , रसोई घर से प्लेटो का आना जाना लगा हुआ था , मीनू के अलावा सब लोग बैठक में जमे हुए थे अपना नाम सुनकर मीनू दरवाज़े की ओट में खड़ी हो गयी
" देखिये !! ऐसा कुछ भी नही हैं , जरुरी नही पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सब लोग दबंग ही हो या घर भर में रॉब जमाते फिरते हो , अगर आपने अपनीबेटी को अच्छे संस्कार दिए होंगे तो वोह घर बनाकर रखेगी नही तो मैं किसी भी शहर की लड़की ले आऊ क्या गारन्टी हैं की वोह घर बनाकार रखेगी , मानती हूँ कि हर शहर का अपना एक कल्चर होता हैं संवाद की अदायगी होती हैं पर घर के संस्कार सबसे उपर होते हैं | हमारी भाभी एक बहुत ही छोटे शहर की हैं इसने जैसे घर सम्हाला हैं कोई नही कह सकता कि यह किसी से कमतर हैं "
मीनू की आँखे अविरल बहने उठी यह वही ननद रानी हैं जो कहती थी छोटे शहर की लड़की हो चुप रहा करो .हमने तो कान पकडे अब पश्चिमी उत्तर प्रदेश की लड़की ना लाये कभी
सच ही तो हैं इंसान के

संस्कार और रिश्तो को निभाने की काबिलियत मायने रखती हैं रहने की जगह नही

23 सितंबर 2013

पूत के पांव

":अबे !!! यो जगह मेरी !! 
मैं बठुगा यहाँ !! 
मेरे बापू ने कहा था सिब से आगे बैठियो ,
म्हारे दादे की जमीन पे स्कूल चले हैं !! वरना देख ले तेरा क्या होगा !! "
१५ साल के धीरज ने बस्ता रखते हुए अविनाश को लगभग धकियाते हुए कहा और इस अचानक धक्केसे
वोह गिर पढ़ा उसका सर पीछे वाली मेज के कोने से लगा और सर से खून बहने लगा .. सब बच्चे घबरा गये धीरज ने सबको धमकी दी के
" गर किसे ने भी म्हारा नाम लिया तो स्कूल के बहार सबको पिट दूंगा "!!
क्लास का दबंग बच्चा और सब चुपचाप बैठ गये अविनाश का रोना जोरो से चालू था तभी कक्षा में अध्यापिका ने प्रवेश किया और अविनाश को जोर से डांट ते हुए बोली चलो चुपचाप अपनी सीट पर .....और जब उसके सर पर बहता खून देखा तो अध्यापिका भी घबरा गयी एक दम से बोली यह क्या हुआ इसके पहले की सब बच्चे कुछ बोलते धीरज बोला मिस यह उधम मचा रहा था खुद गिरा और नाम मेरा लगा रहा हैं ... तभी पल्लवी ने कहा नही टीचर यह धीरज की गलती हैं ." साली बाहर निकल तब बताउंगा !!! स्कूल से नाम न कटा दिया तो देखना .!! कहते हुए धीरज नेपल्लवी के बाल पकड़ लिए !! बीच बचाव में बड़ी मुश्किल से अध्यापिका को पल्लवी को अलग किया और जब धीरज को समझाने के लिय आगे बढ़ी तो वोह अंगुली देखाते हुए बोला ओ टीचर फालतू मत बोल !! अभी ज्वाइन किया न स्कूल !!! अध्यापिका सोचने लगी धीरज की धमकी के बारे में उसके संस्कारों के बारे .............और अपनी नौकरी के बारे में ........

पूत के पांव पालने में दिखाए दे रहे थे

नीलिमा शर्मा

10 अगस्त 2013

आँखे

निशा की
आँखे दर्द कर रही थी, कई दिनों से जलन हो रही थी बस हर बार खुद का ख्याल न रखने की आदत और हर बार अपना ही इलाज टाल जाना उसकी आदतों में शुमार हो गया था । सुनील आज जबरदस्ती उसको दृष्टि क्लिनिक ले ही गये .. . सामने कतार लगी थी । इतने लोग अपनी आँखे टेस्ट करने आये हैं, सोच कर निशा को हैरानी हुई । अपना नंबर आने पर भीतर गयी और डाक्टर की बताई जगह पर चुपचाप बैठ गयी .. आँखे टेस्ट करते हुए डाक्टर की आँखों में खिंच आई चिंता की लकीरों को निशा ने बाखूबी पढ़ लिया था । स्ट्रेस जांचा जा रहा था उसकी आँखों में कई अलग अलग मशीनों पर, सुनील परामर्श शुल्क चूका रहे थे अलग अलग काउंटर पर और निशा अलग अलग मशीन पर जाकर आँखे दिखा रही थी । मन चुप था कुछ कह पाने में असमर्थ सा । आखिरकार 3 घंटो के बाद डाक्टर ने अंदर बुलाया और कहा देखिये .. सुनील जी आपकी पत्नी की आँखों में काला मोतिया बिंद की शुरूवात हैं अभी कुछ कहा नही जा सकता, यह दवा डालिए और तीन माह बाद फिर से चेक-अप के लिय आइये । बस दोनों वापिस लौटे, दोनों गम में थे, अपनी अपनी सोचो की परिधि में ... कि इलाज का खर्च कितना आयेगा, घर कौन सम्हालेगा.मुझसे कैसे सम्हाला जयेगा घर , निशा की सोच थी क्या मेरी आँखे ठीक हो पायेगी ..... वैसे ही मैं अकेली हूँ मन से और अब ??? क्या सुनील मेरा ख्याल रखेंगे जिसने उम्र भर कभी पानी तक न पिया अपने हाथ से क्या अब उसका ख्याल करेगा बस अपनी गति से चल रही थी और उन दोनों का मन अपनी गति से .......... और उदास था दोनों के मन का अपना अपना कोना 

.....नीलिमा शर्मा

7 अगस्त 2013

बात करोगी ना मुझसे

" मत करो ना मुझे इतनी रात  को फ़ोन । कहा था न मेरी तबियत ठीक नही हैं  और आपको कोई फर्क नही पढता  रूमानियत का आलम  इस कदर छाया हैं तुम पर के तुम न वक़्त देखते हो न  माहौल . बस सेल फ़ोन मिलाया  और कैसी हो तुम !!!!  क्या पहना हैं आज ??""
 अभी ३ महीने भी नही हुए थे कामिनी की सगाई को .और दिनेश  उसे देर रात  को रोजाना फ़ोन करता था 
अब कैसे कहे कम्मो कि उसे नही पसंद था ऐसी वैसी बाते करना  
"नाराज हो गया न  दीनू " अभी उसका फ़ोन आया था  कि "आपकी बेटी क्या किसी और को पसंद करती हैं जो मुझसे बात नही करती   बात करेंगे तभी तो एक दुसरे को समझ पाएंगे हम  और तुम हो कि  हमेशा अपनी ही दुनिया में  गुमसुम रहना पसंद करती हो "
माँ के गुस्से वाले शब्द सुन कर कम्मो मन ही मन ड र गयी थी  बड़ी मुश्किल से यह रिश्ता हुआ था वरना २ ९ साल की लड़की को कहाँ  अछ्हा  बिज़नेस  वाला लड़का मिलता  हैं ..पर उसकी द्विअर्थी बाते ............उफ़्फ़्फ़्फ़्फ़्फ़  
 सोचते सोचते  कम्मो की उंगुलियां  दिनेश का नम्बर मिलाने   लगी .....अब शादी तो करनी हैं  आदत बनानी होगी उसको ऐसे बातो की ........

14 मई 2013

चुन्नी के किनारे

भरे पूरे परिवार में माँ आ ज भी अकेली थी  .बेटियाँ  अपने अपने घरो में
थी अब सुखी थी या दुखी थी माँ नही जानती क्युकी उन्होंने  कभी माँ से कहा
ही नहीकि हमारेससुराल में यह बात हुयी वो  बात हुयी सबने  अपना भाग्य मान
कर जो मिला स्वीकार कर लिया
 और अब तो सबने खुश भी देखाना शुरू कर दिया था   रेशमी चुन्निया  पर कब
तक आंसू सोखती हैं  और माँ की आँखे  कब तक सच से अनजान रहती हैं    माँ
की आँखे पढने लगी काले होते घेरो में छिपे राज   /  फीकी सी हंसी में
छिपे दर्द को


      अब माँ भी बहु ले आई थी   इकलोती बहु के चाव सबको थे चाहे माँ थी
या पापा  . बहने एक -दो दिन को आती   रहेगी  घर तो बहु का होता हैं
सोच माँ ने सारी ग्रहस्थी  बहु को  सौंप  दी / नए ज़माने की बहु  जिसके
लिय आटा घूधना मनिक्योरे का ख़राब होना था / सब्जी बनाने से मसाले की महक
उसके डियो   की महक को ख़तम कर देती थी /. दिन भर घूमना   और  सज संवर कर
पति को  रिझाना  बस यही उसकी जिंदगी का मकसद  हो   जैसे . पति ने अपने
ऑफिस में उसको  नौकरी दिला  दी अब वोह कम काजी महिला थी   अब  माँ  घर का
काम करती   बेटे  की माँ रानी   अब घर की नौकरानी  बनकर रह  गयी  घर में
विलासि ता का सामान बढ़ ने लगा  और इंसानों का मान घटने लगा

 गर्मिया हैं  बेटियाँ आरही हैं  छुट्टियों में ३ दिन के लिय   अपने घर
बार भी हैं उनके  .. बहु शिमला  चली गयी उस को भीड़ पसंद नही न ही दिन रात
का शोर  उसको सुकून  चाहियी  .....माँ अब  खाना बना रही हैं जल्दी जल्दी
 सब आने वाली हैं ..... उसको भी खुद को खुश देखाना हैं  आखिर माँ हैं वोह
भी  बेटियों से कम थोड़े हैं किसी भी बात में .......................
                                                      अब बेटियाँ भी पढ़
कर भी चुप हैं माँ की सूती

चुन्नी के किनारे भीगे देख कर

14 जनवरी 2013

Sanskaar

आज फिर माँ ने फ़ोन छीन लिया . जीनत का सन्देश आया होगा , पता नही माँ को क्या हो जाता हैं जब भी सेल फ़ोन में सन्देश को पढने लगता हूँ माँ अचानक कमरे में आ जाती हैं । उम्र हो गयी माँ की जितना भी खुद को प्रगतिशील कहती रहे अंदर से दकियानूसी विचार ही होंगे न । मेरे सब दोस्तों को देखो सबकी कोई न कोई लड़की दोस्त है मुझे तो माँ किसी लड़की से बात करते भी देख लेगी तो बेहोश हो जाएगी कि 
"क्या यह संस्कार दिए हैं मैंने "। 
"पढ़ा मत कर बस जब देखो लडकियां ।" 
अब आजकल माँ को पता नही क्या हो गया हैं जब देखो मुझे भाषण देती रहती है कि  लडकियों से लड़ा मत कर, ज्यादा बात न किया कर ,बस पढाई में ध्यान लगाया कर ,अच्छा बच्चा बन
कितना अच्चा बच्चा बनू /
 जब से यह दिल्ली में   वोह  दामिनी वाला कांड हुआ हैं सबकी मम्मियां बदल गयी हैं  उस पर से यह मीडिया वाले !!
अखबार में शोर मचा  हैं कि  माए अपने लडको मैं संस्कार नही भरती  ! अब संस्कार भी क्या कोई  दवाई हैं जो माँ  हमें खिल देगी ।हम ऐसे काम नही करेंगे  ।अब हम थोरे ही गलत हैं।  अब उन 6 लडको ने जो किया उसका खामियाजा हम क्यों भुगते ?हां अब दोस्तों मैं लडकियों को लेकर हसी -मजाक तो चलता ही हैं पर इन मम्मा लोग को कौन समझाए ?
                                                                 अब कल परवीन की माँ ने उसको ऋचा का मजाक उड़ाते सुन लिया तो बरस पढ़ी ।अब उन्होंने सिर्फ उसको सुना ,उधर से ऋचा क्या क्या बोल रही थी, आंटी को नही पता चला था ।अकेले परवीन ही परेशान नही था क्लास के सारे लड़के लडकिया परेशान थे। परसों अभी की जन्मदिन पार्टी सिर्फ इसी वज़ह से दिन में रखी  गयी क्युकी किसी भी लड़की की माँ उनको शाम 8 बजे तक बाहर रहने की अनुमति नही दे रही थी और किसी भी लड़के की माँ शाम की पार्टी में लडकियों को बुलाने के पक्ष में नही थी  ! अब यह क्या बात हुए ?जब हम क्लास मैं पड़ते हैं तो क्या हम यह सोच कर पढ़ते है के मैं लड़का हूँ यह पाठ पढू और यह लड़की . कितनी गलत बात हैं न !!!!?
:"सोनूऊऊऊउ "
लो हो गयी शुरू मेरी मदर इंडिया अब होगा इनका प्रवचन शुरू "
झुन्झुलाते हुए सुनील ने सामने पढ़ी किताब को खोल लिया और पढने का बहाना बनाने लगा
माँ आई और ढूध  का गिलास रखकर प्यार से सर पर हाथ फेर कर चली गयी
"दूध का गिलास हुह जब देखो यह खा ले वोह खा ले "
. " कभी मुझे अपनी जिन्दगी तो जीने नही देती .
यह फेसबुक ने भी माँ लोगो को बिगाड़ दिया है पता नही कैसे कैसे सहेलियां  बना लेती हैं खुद तो अनजान दोस्त बना लेगी और हम हैं कि  जान पहचान वाली लड़की के साथ स्कूटर पर भी कही नही जा सकते . जब मैं बड़ा हो जाऊँगा न अपने बच्चो को जो चाहे करे करने दूंगा . 
नही पीना मुझे ढूध्ह ."
सोचते सोचते सोनूका दिमाग कहा से कहा पहुच गया  यह उम्र ही ऐसे होती हैं कब कोन  सी बात पर चीड़  जाये कहा नही जा सकता । किसी भी बात पर उनको अपना स्टैंड सही लगता हैं  किसी भी बात को गलत कहा जाए तो  बहस करने को तैयार । उल्टा जवाब देने से मना  करो तो बोलेंगे  माँ हम क्या हम अपनी बात भी नही कह सकते , आप तो बस हमें डांट कर चुप करा देती हो ।अब बच्चे  हैं न सोचो में कहा से कहा तक पहुँच जाते हैं और वक़्त बेकार हो रहा हैं इसका उनको भान ही नही होता
"पापा आ गये पा आ गये "
लवलीन की आवाज़ सुनकर सुनील भी अपने से बाहर की तरफ आया
" अरे वाह ! पापा यह क्या गिफ्ट लाये हो आप !"
"बच्चे मेरा प्रमोशन हो गया हैं "
"आज दफ्तर में  समारोह था उसमे मुझे यह उपहार मिला हैं "
"पापा मैं इसको खोलू?"
"हाँ बच्चे आप इसको खोल कर देखो और अपनी माँ को दिखाओ "
अर्राए !! यह सब क्या हैं
"पापा आये नही के तुमने उनकी तलाशी लेनी शुरू कर दी चलो जाओ यहाँ से , पापा को आराम करने दो "
 उफ़ यह मम्मी भी न !!!!
मन में गुस्सा लिए सुनील अपने कमरे की तरफ  बढ गया
यह मम्मी भी न जब देखो पापा पर अपना एकाधिकार जमा लेती हैं
"दिन भर इनकी किट्टी पार्टी वाली सहेलियों के फ़ोन आते हैं फेस बुक तो खुला ही रहता है आते - जाते झांक लेती हैं किसने क्या लिखा और शाम होते ही पापा पर इनका एकाधिकार यह तो अच्छी बात हैं लवलीन हैं जो उसके साथ खेल लेता हूँ थोड़ी देर
टी।व् भी कुछ देर ही देख पता हूँ  उसकी मेहरबानी से  वरना माँ को तो मुझे दुनिया का सबसे अच्छा  बच्चा बनाने का मैडल लेना हैं "
अब  होम वर्क कर न होगा  कल सुलेकना का जन्म दिन हैं स्कूल मैं ही सबके लिय बर्गर और केक लेकर आएगी अगर माँ को बताया तो कहेगी की 
"क्यों? अपने घर का खाना कहो "
ब्लाह्ह ब्लाह्ह ब्लाह्ह 
कितना बोलती हैं यह माँ लोग "






पापा!!!
सर पर प्यार भरा स्पर्श पाकरहोमवर्क में  मग्न  सुनील का चेहरा खिल गया । पापा के हाथ में खाने की थाली थी . हाथ से एक एक कौर तोड़ कर खिलाते हुए पापा ने ढेरो बाते की
"पापा ! एक बात बताओ क्या लडकियों से लड़ना गलत बात हैं "

"नही बेटा !!!क्यों गलत ! जैसे तुम अपने लड़के दोस्तों  से लड़ते हो वैसे ही उनसे भी लड़ो न वोह तुमसे कमथोडे  ही हैं न "
पापा हस पढ़े
उनको माँ याद आगयी होगी न
"पापा फिर माँ क्यों कहती हैं अब लडकियों से ज्यादा बात मत करो उनको दोस्त नही बनाओ"
 कल सिम्मी आंटी भी कह रही थी के जिस लड़की के लिय दिल्ली में धरना प्रदर्शन हो रहा हैं वोह एक दोस्त के साथ घूमने गयी थी अब  तो बाबा अपने लडको को ही लडकियों से दूर रखो" ऐसा क्यों पापा
क्या अब जीनत का दोस्त नही रहा मैं ? वोह मेरी गर्ल फ्रेंड थोड़े ही है

बच्चे की आँखों में जब सवालो का तूफ़ान उठ'ता हैं तो उसको शांत करना कितना मुश्किल होता हैं ..... आजकल के बच्चे कितने मोर्चो पर लड़ रहे हैं पढाई का बोझ , अच्छे नंबर लाने की होड़ , घर में तनाव की हट आहात उनको परेशान  और   उनको कमजोर बना देती हैं उस पर यह टी।वी और यहमाता -पिता  का फेस बुक प्रेम बच्चो का  रहा सहा टाइम भी उन्होंने ले लिया
सर पर हाथ फेरते हुए सुनील की आँखों में झांकते हुए पापा बोले
"बेटा  दुनिया में जितने भी साधन बने हैं सब मनुष्य की सहूलियत के लिए बने है परन्तु हमने ही  उनको विलासिता बना लिया हैं सबका अब दुपयोग हो रहा हैं आपको सेल फ़ोन दिया गया था की आप जहाभी जाओ हमारी पहुच में रहो आपको कोई भी जरुरत हो आप हमें बुला सको क्युकी अब वो जमाना नही रहा के कोई अजनबी से सहायता ली जाए या वोह सहायता कर भी देगा उसकी गारंटी नही । लेकिन आप सारा  समय व्हाट'स उप पर लगे रहते हो या दोस्तों के साथ संदेशो  का आदान-प्रदान में !इसी तरह जिस तरह का व्यवहार आप अपने लड़के दोस्तों से करते हैं उसी तरह का व्यवहार अपनी लड़की मित्रो से रखो इस उम्र में बहुत आच्छा  लगता हैं विपरीत लिंगी का अपने पास होना , तुम लड़कियों  से दोस्ती रखो परन्तु याद रहे की  हर रिश्ते की एक मर्यादा होती हैं हमें हमेशा अपनी सोचो में भी याद रखना चाहिए की  जैसा हम सोचते है जरुरी नही दूसरा भी ठीक वैसा ही हमारे लिय सोचता होगा इस लिय सबकी सोच की इज्ज़त करनी चाहिए  और किसी के भी स्पर्श को पहचान न चाहिए  न तो किसी को खुद को स्पर्श करने दो न ही किसी को भी स्पर्श करो . भगवन ने हमें लड़का या लड़की बनाया तो हमें दुसरे लिंग की भावनाओ का सम्मान करना चाहिए ।"
                                                          " माना आज तुम्हे एक लड़की बहुत ही प्यारी से लगने लगी हैं तुमको उसका साथ हर वक़्त पसंद हैं तुम दिन में 10 सन्देश उसके सेल पर भेजते हो तो क्या होगा !! तुमको तो वोह पसंद हैं परन्तु उसको तुम न पसंद हो तो या उसको तुम्हारे संदेशो से कुछ फर्क नही पड़ता या उसकी परिवार को नही पसंद होगा यह सब आब उस लड़की को आपकी वज़ह से कितनी परेशानिया होंगी न ..क्या आप चाहोगे के जिसे आप पसंद करते हैं के वोह परेशान हो तो उसकी ख़ुशी के लिय अपने चारो तरफ एक सीमा बनाओ के कोई भी मित्र को चाहे लड़की हो या लड़का न तो हद्द से ज्यादा उसके पीछे पढो न उसको नेगलेक्ट करो बस उसकी शक्सियत को इज्ज़त दो आगे जाकर देखना जब तुम जिन्द्दगी में कुछ बन जाओगे तुम्हारे अच्छे नो आयेंगे तुम कक्षा में आल राउंडर बनकर आसेम्बली मैं खड़े होगे तो सब चाहेंगे के तुमसे दोस्ती करे "
पापा पर वोह जो दिल्ली वाली लड़की थी उसके साथ जो लड़का  दोस्त था उसने गलत किया था  उसके साथ रहकर /जाकर "....... सोनू ने झिझकते हुए पुछा
"नही बेटा  !!!वोह बहुत बहादुर था उसने कुछ गलत नही किया था द्द्दो दोस्त है एक साथ कही जाकर वापिस आ रहे थे बस कुछ राक्षस जैसे लडको ने उनके साथ गलत किया था इसका यह मतलब नही है कि  सब लड़के गलत हैं  न ही  आप गलत हो कि आपको अब लड़की से बात नही करनी ."पापा ने प्यार से सर पर हाथ लगते हुए कहा
"फिर मम्मा क्यों कहती हैं के अब लडकियों में ध्यान न दिया करो "
 "सही तो कहती हैं  आपकी पढाई की उम्र हैं लड़की को दोस्त मानो मनोरंजन का एक साधन नही
और बच्चे !  मम्मी भी एक लड़की है न
अब जब उस लड़की के साथ इतना सब कुछ बुरा हुआ तो अंदर तक उद्वेलित है
उनको बहुत गुस्सा हैं सब पर, पर हम पर नही तुम पर नही वोह हमारी हैं न"  आँखों में आँखे डाल कर पापा ने समझाया
उनको लगता हैं के समाज में बदलाव हो परन्तु कैसे नही जानती . हम दोनों है न हम आपकी मम्मी को कभी ऐसा मौका ही नही देंगे कि  उनको लगे कि  लड़के लडकियों से गलत व्यवहार करते हैं आपका फ़ोन भी उन्होंने जीनत के सन्देश के लिय नही छिना था उन्होंने आपका फ़ोन इस लिय लिया था क्युकी आपके फाइनल परीक्षा पास आरहे है बस इसी लिय 
                         बस उनका तरीका गलत था सारा दिन अखबार , नेट टी।वी पर देख देख कर उनका मन आक्रोशित हो गया हैं अब हमको ही उनको समझना है न "
सुनील का बल मन सोच में पढ़ गया हाँ पापा सही तो कह रहे है मम्मा के मन में परेशानी होगी तभी गुस्से में बोल गयी मुझे वैसे तो है न मेरी प्यारी मम्मा 
 ओके अब मैं मम्मी  को कभी यह महसूस नही होने दूंगा कि
 हर लड़का गलत होता हैं और उनका प्यारा बेटा बनूगा  कमरे सेबाहर दौड़ लगते हुए सुनील जोर से चिल्लाया
"ंंमाँ आआंंआआआआआआआआ
सुनो कल मेरी एक दोस्त का जन्म दिन हैं कोई गिफ्ट दो न उसके लिय .. 
 सब स्कूल मैं ही जन्मदिन मनाएंगे  क्युकी सबको पढना भी है न और हाँ आप मेरा सेल फ़ोन भी अपने पास रख लो जब कही जाऊँगा आप से ले लूँगा "
 पापा परदे के पीछे से देख रहे थे  की बच्चे कितने कोमल होते हैं माँ समझाए या पिता . संस्कार देने से आते हैं समझाने से नही अनदेखी करने से नही 
 आँखों में आंसू लिय पत्नी को देखकर भीग गया उनके मन का भी एक कोना ........................................

18 दिसंबर 2012

Maa ki Najar se

अम्मा!!!!! अम्मा!!!!!! 
फ़ोन पर किसी की बात सुनकर रमेश  जोर से चिल्लाया ......आधी रात को कोई बुरा सपना देख लियो का ? यह लड़का भी ना , रात  भर देर तलक पढता हैं  फिर सुबह मुंह ढापे पढ़ा  रहता हैं .मीना की माँ ने रजाई एक तरफ सरकाई  और  पलंग   के पास चप्पल खोजने लगी .तब तक रमेश अम्मा के पास आ पहुंचा .उसकी बदहवासहालत देख कर अम्मा का दिल जोर से धड़क   उठा   "क्या हुआ?"
"अम्मा ! वोह  .वॊऒऒऒऒऒऒऒ "
 "क्या वॊओ वॊऒओ किये जा रहे हो क्या हुआ "
 "अम्मा! वो जीजी जी ....जी इ इ इ इ इ "
 "हाय रे! मेरी फूल सी लाडो  को क्या हुआ/" 
 "अम्मा वो हस्पताल में हैं "
 "हाय रे   !!!"
 "लग गयी होगी ठण्ड  मरजानी दिल्ली की ठण्ड भी तो।। "
" कित्ती बार कहा इस लड़की को  गरम कपड़े पहना कर पर  यह आजकल की लडकियाँ " ! 
"इस बार तो लड्डू भी न भेजे मैंने बनाकर "
 "पिछली बार भी कित्ती खांसी हुई थी ओर  बुखार भी .. "
 अम्मा थी कि बुदबुदाये    जा रही थी  खुद ही खुद पर  कभी खुद को कोस रही  थी  कि  इस बार लड्डू क्यों नही बना कर भेजे 
 खुद डाक्टर बन रही हैं पर इलाज तो माँ के ही काम  आते हैं ना . चार किताबे पढ़ लेने से  जिन्दगी पढनी नही आ जाती इन बच्चो को 
 अलमारी से अपने गरम कपडे निकल कर बैग में ठूंसती  अम्मा अनजान थी कि रमेश अपने बाबूजी के कान में क्या कह रहा हैं उन्हें तो अपनी फूल सी मीना याद आ रही थी  कितनी मेधावी थी उनकी मीना . उनकी बिरादरी वालो ने बहुत चाहा  की कि अम्मा अपनी मीना का ब्याह कर दे अच्छा  घर बाहर देखकर , पर अम्मा को मीना का सपना पूरा करना था उसको डाक्टर बन ना था 
 4 साल देहरादून के एक पैरामेडिकल  से उसने पढाई की  अब उसको इंटर्न शिप करनी थी 
 "देहरादून में भी बहुत स्कोप हैं  परन्तु दिल्ली में इंटर्नशिप करने से अच्छी नौकरी मिलेगी  '...मीना की बात से अम्मा ने उसको दिल्ली भेज दिया 
 कितनी खुश थी लाडो .परसों ही तो फ़ोन पर बात की उसने के अम्मा आप परेशान मत होना मैं  यहाँ ठीक हूँ 
 जानती थी अपनी बेटी को  बहुत ही संस्कारी लड़की हैं  ऐसा नही कि उसने अपनी बेटी को नए ज़माने के साथ चलना नही सीखाया था  परन्तु उसकी बेटी ही इतनी गुणवान ओर संस्कारी थी कि कुछ भी करती थी तो माँ के संज्ञान में ...
 ना जाने कैसे होगी ?
  नहा कर जब बाहर आई तो देखा कि  रमेश के बापू भी तैयार होकर खड़े थे  कितने खिलाफ थे यह मीना के डाक्टर बन जाने के ...कि  जमाना बहुत ख़राब हैं  लड़की जात हैं ब्याह के अपने घर जाए वह जाकर जो मर्जी करे जितना मर्जी पढ़े ...आज बिटिया  की तबियत जरा सी नासाज हुई  नही कि  साथ चलने को तैयार हो गये . मीना की अम्मा मन ही मन मुस्कराने लगी ...... कार में बैठ  कर भगवन को  मन ही मन नमस्कार करके यात्रा शुभ हो की कामना करने लगी 


 सुबह के चार बजने को हैं सुबह  ट्रैफिक कम होता हैं फिर भी रमेश  ने कार तेज स्पीड से चलानी शुरू कर दी 
 शायद बहन की फ़िक्र हैं इसको भी  भगवन इन भाई बहन का प्यार हमेशा बनाये रखे  . उसने नजर भर कर रमेश के बाबूजी को देखा ... कैसा पीला लग रहा हैं चेहरा .... बेटी की फ़िक्र या इतनी जल्दी सुबह उठने की  वजह से ... जो भी हो जब बेटी का हाथ हाथो में लेंगे और वोह कहेगी कि   बाबूजी  ताश खेले  भाभो में हर बार की तरह इस बार भी मैं  ही जीतूंगी  तब देखना कैसे ंमंद मंद ं मुस्करायेंगे 
 कार तेजी से दौड़ रही थी साथ ही मन भी .... बस मीना की डाक्टरी  पूरी हो जाए  तो इसका ब्याह कर दूँगी  अगले साल ... छोटे छोटे नाती नातिनो के साथ खेलने का बड़ा  मन करता हैं .साथ वाली रामो जब अपने बच्चो संग मायके आती हैं और उसके बच्चे जब उसको भी गोरी  नानी  कहते हैं तो मन कही सुकून सा पाता  हैं कि  उसके नाती भी उसको गोरी नानी कहेंगे या आजकल के  माँ - बाप की तरह मीना भी उनको बड़ी मम्मा कहना सिखाएगी 
 सोचो के सागर में गोते खाती  मीना कब दिल्ली पहुँच गयी पता भी नहीं चला . कार सफदरगंज अस्पताल के सामने रूक गयी रमेश तेजी  से  रिसेप्शन पर पंहुचा  अम्मा सामने रखी कुर्सी पर  बैठ गयी 
 सुबह सुबह अखबार पढने ंका आनद ही कुछ और होता हैं . पहले पेज के तीसरे कलम में एक खबर पर नजर एक पल को रुकी " दिल्ली ंमें चलती बस में एक छात्रा से गैंग  रेप " 
"निगोड़े ,"क्या हो गया यह आजकल के बच्चो को ! लडकिया दिल्ली जैसे राजधानी में ही जब स्सुरक्षित नही तो गाँव  के दबंगों के सामने उनकी क्या हिम्मत !  मन ख़राब सा हुआ पढ़ कर ओर अखबार सामने रख कर  देखने लगी कि  रमेश  किदर गया ? 
 सामने से दो पुलिस वालियों के संग  रमेश आ रहा था "इसकी आँखे रोई सी क्यों हैं ?  माँ का मन आशंकित हुआ 
" अम्मा जी ःहिम्मत रखो  हम आरोपी को छोड़ेगे नही . "
"अरे हुआ क्या?????????????????"
" मेरी बच्ची को क्या हुआ ?"
"अरे रमेश!!!!"
" हाय मेरी बच्ची !"
 तेजी से कदम रखती वोह आई सी यू  की तरफ भागी जिधर  से रमेश आ या  था 
"हाय मेरी बच्ची  !!!तुझे भगवान् मेरी भी उम्र दे "
मन ही मन बलाए उतरती एक माँ की आँखों से आंसू बहने लगे 
रमेश के बाबु जी माथा पीट रहे थे 
 रमेश की आँखे खून के आंसू रो रही थी 
 पुलिस वाली ने हाथ थामकर उनको सब बताया 
( नही सीसा उड़ेल दिया उसके कानो में )
 वोह सब !!
 जिसको कभी कोई माँ- बाप नही सुन ना  चाहेगा 
 कोई भाई  इस दिन को देखने से पहले मर  जाना चाहेगा 
 अपनी हाथ की राखी उसको जहर लगने लगेगी 
 उसके सामने अखबार की वोह खबर घूम गयी 
 धच्च! से वोह जमीन पर गिर गयी 
 पूरी दिल्ली में सिर्फ मेरी बेटी !!!
.....
.
.
 अब माँ के हाथ जो उसकी सलामती की दुआ कर रहे थे 
  सोचने लगे कि  वो दुआ करे तो क्या? 
 सुन्न था  उसके लहुलुहान  मन का कोना 
 नीलिमा शर्मा 

10 दिसंबर 2012

Mayka ( मायका )

सोफे पर पीठ टिकाये  निशा ने आँखे मूँद ली . पर आँखे मूँद लेने से  मन सोचना तो बंद नही करता न .  मन की गति पवन की गति से भी तेज होती हैं . एक पल मैं यहाँ तो दुसरे ही पल सात समंदर पार .,
एक पल मैं अतीत के गहरे पन्नो की परते उधेड़ कर रख देती हैं तो दुसरे ही पल मैं भविष्य  के नए सपने भी  देखना शुरू कर देती हैं .  निशा का मन भी  उलझा हुआ था अतीत के जाल में .  तभी फ़ोन की घंटी बजी 
" हेल्लो "
"हाँ जी बोल रही हूँ "
"जी"
 "जी "
" जी अच्छा"
" में उनको कह दूँगी "
 "आपने मुझसे कह दिया तो मैं  सब इंतजाम कर दूँगी ""
 "विश्वास कीजिये मैं  आप को  अच्छे से अटेंड करुँगी आप आये तो घर "
" यह तो शाम को ही घर आएंगे इनका सेल  फ़ोन भी  घर पर रह गया हैं "
"आप शाम को 7 बजे के बाद दुबारा फ़ोन कर लीजियेगा "
 "जी नमस्ते "

                                                                                           फ़ोन रखते ही पहले से भारी मन  और भी व्यथित हो उठा  एक नारी जितना भी कर ले  पर उसकी कोई कदर नही होती हैं   सुबह सुनील से निशा की बहस भी  उसकी बहन को लेकर हुई  थी  यह पुरुष लोग अपने रिश्तो के प्रति कितने सचेत होते हैं ना  स्त्री के लिए घर  आने वाले सब  मेहमान एक से होते हैं  परन्तु पुरुषो के लिय अपने परिवार के सामने उसकी स्त्री भी कुछ नही होती,न ही अपना घर , खाने के स्पेशल व्यंजन  होने चाहिए , पैसे पैसे को दाँत  से पकड़ने वाला पति  तब धन्ना सेठ बन जाता हैं  पत्नी दिन भर खटती  रहे  पर  उसपर अपने परिवार के सामने एकाधिकार एवेम आधिपत्य दिखाना पुरुष प्रवृत्ति होती हैं 
                                                            सुनील की बहन  रेखा  सर्दी की छुट्टियाँ   बीतने के लिय  उनके शहर आने वाली थी  सुनील चाहता था कि  उनका कमरा  एक माह के लिए उनकी बहन को दे दिया जाए   निशा इस बात के लिए राजी नही थी  पिछली बार भी दिया था उसने अपना कमरा  दीदी को रहने  के  लिए .....
                                                                                                              दिन भर रजाई में पड़े रहना  पलंग के नीचे मूंगफली के छिलके , झूठे बर्तन , गंदे मोज़े  निशा का मन बहुत ख़राब होता था  काम वाली बाई भी उनके तीखे बोलो की वज़ह से उस कमरे की सफाई  करने से कतराती थी . निशा के लिए सुबह स्नान के लिए  अपने एक जोड़ी  कपडे निकलना भी मुश्किल हो गया था तब .. उनके जाने के बाद जब निशा ने अपना कमरा साफ किया तो तब जाना था  उसके कमरे से अनेक छोटी छोटी चीज़े गायब थी  उसके कई कपडे ,  बिँदिया , पलंग के बॉक्स से चादरे ....
 मन खट्टा हो गया था उसका पिछले बरस  कि  अबकी बार आएँगी तो इनको अपना कमरा बिलकुल नही दूँगी सुनील मान लेने को तैयार ही न था  इस बार उनकी बहन छोटे कमरे में   रहे .
"                                                        निशा का मन अतीत में  जाता हैं अक्सर . मायका तो उसका भी हैं  वोह कभी दो दिन से ज्यादा के लिए नही गयी  सुनील का कहना हैं ....
".रही थी न 22 साल उस घर में    
अब भी तुम्हारा मन वहां ही क्यों रमता है ? 
अपना घर बनाने की सोचो बस !!
अब यही हैं तुम्हारा घर ..."
अब .जब भी जाती हैंमायके तो  अजनबियत का अहसास रहता हैं वहां , माँ बाबूजी उम्र के उस पड़ाव पर हैं जहा उनके शब्दों का कोई मोल नही अब , जैसा बन जाता हैं खा लेती हैं निशा  . बच्चे अगर जरा भी नखरे करे उनको आँखे तरेर कर चुप करा देती हैं  चलते  हुए माँ मुठ्ठी में बंद कर के  कुछ रुपये थमा देती हैं  और एक शगुन का लिफाफा 4 भाइयो की बहन को  कोई एक भाई " हम सबकी तरफ से " कहकर थमा देता हैं  ............न कुछ बोलने की गुंजाईश होती हैं न इच्छा .

                                       किस्मत वाली होत्ती हैं न वोह लडकिया  जिनको मायका नसीब होता हैं  जिनके मायके आने पर खुशिया मनाई जाती हैं , माँ की आँखों में परेशानी के डोरे नही खुशी के आंसू होते हैं 
टी वी पर सुधांशु जी महाराज बोल रहे थे  बहनों को जो मान -सम्मान मिलता हैं   जो नेग मिलता हैं  उसकी भूखी नही होती वोह  बस एक अहसास होता हैं कि इस घर पर आज भी मेरा र में आज भी हक हैं 
 निशा ने झट से आंसू पोंछे ,  फ़ोन उठाकर सुनील को  उनके दूकान  के नंबर पर   काल किया 
 "सुनो जी , बाजार से गाजर लेते आना , निशा दी कल शाम की ट्रेन से आ रही हैं  गाजर का हलवा बना  कर रख दूँगी उनके चुन्नू को बहुत पसंद हैं   "
  कमरे की चादर बदलते हुए  निशा सोचने लगी  ना जाने रेखा दीदी  ससुराल में किन परिस्तिथियों में रहती होगी  कैसे कैसे मन मारती होगी छोटी छोटी चीजो के लिए  . शायद यहाँ आकर उस पर अपना आधिपत्य दिखा कर उनका स्व संतुष्ट होता होगा . कम से कम किसी को तो मायका जाना सुखद लगे और खुश रहे उसके मन का रीता कोना !!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!! 


 नीलिमा शर्मा 

17 अक्टूबर 2012

Jhumki


आज फिर झुमकी रो पड़ी ............आंसू टप-टप बह रहे थे . अहसासों का कोर कोर मानो  लहुलुहान था , आखिर क्यों उसका हुक्का-पानी बंद कर दिया मोहल्ले वालो ने     
 मन के आंसू  धुधली छाया लिए  उसे बीते साल की यादो मे ले गये   ........ सब मोहल्ले वालिया  नुक्कड़ पर खड़ी थी      कभी इसकी कभी उसकी   बुराई की जा रही थी  . उसको कतई पसंद नही था यह सब करना  जब उसको सबने आवाज लगायी तो उसने आने से मना कर दिया   के घर में ढेरो काम पड़े  हैं मुझे ट़ेम नही यहाँ आने का     . बचपन से अपनी किताबो मे घुसी रहने वाली झुमकी मोहल्ले की सबसे ज्यादा पढ़ी लिखी ओंरत थी  . हर  वक़्त मोहल्ले के चोराहों पर आते जाते आदमियों की नज़रो का स्वाद बन'ने की अपेक्षा उसको सिलाई करना पसंद था     घर का हर कोना उसकी सुघड़ता   की गवाही देता था . छोटे से घर में अपने दो बेटो के साथ बहुत खुश रहती थी  हर  मिया-बीबी की तरह किसनवा से लड़ भी लेती थी  तो बच्चो की शरारत पर उनको पीट भी देती थी हर तरह से आम  औरत थी बस यह चौराहा   उसको पसंद नही था . धीरे धीरे मोहल्ले की ओरते जो कभी उस से बात करने मे फख्र महसूस करती थी  अब उसको घमंडी कहने लगी उसके सुथरे कपडे सबकी आँखों मैं खटकने लगे सबके मर्द" झुमकी को देख जरा "कहकर अपनी बीबियो    को चार बात कहने लगे थे . पिछले बरस उसने गीतली के घर कीर्तन मैं सुमनी को उसकी सास/पति  की बुराई करने से टोक दिया  तो सबने उसको स्पेशल ओंरत का तमगा पहना दिया  जैसे सास/पति  की बुराई  करना हर औरत   का  अधिकार हैं  अब किसनवा अगर प्यार करता हैं तो क्या हुआ अगर गलत काम पर गुरियता भी हैं  जब बख्त आता हैं तो झुमकी भी तो उसको खूब सुना देती हैं  यह बात हर औरत  को समझ नही आती सबकी सब अनपद औरत  नारी मुक्ति आन्दोलन की नेता बनी फिरती हैं एक का मर्द मारे सब इकठ्ठी हो जाती हैं खुसर-फुसर करने को .पर झुमकी ने न कभी किसी को बुलाया न कभी किसी के यहाँ चुगली करने गयी .बस यही से उसको घमंडी कहा जाने लगा धीरे धीरे सब  को लगने लगा के  यह हमारे जैसे क्यों नही      और   


                                              आज  अरसे बाद उसने अपने घर मे माता का कीर्तन कराया .............. दो चार बुजुर्ग औरते   आई बाकि कीर्तन मण्डली वालियों ने भी अलग ढोलक बजा ली  के  बहुत बनती थी न  बजा ले घंटी  मंजीरा अपने आप .............किसी ने नही सोचा शक्ति औरत में  खुद विराजमान  हैं .........क्यों इक दुसरे की दुश्मन बनी हैं वोह ...............  क्या कसूर रहा उसका . क्यों नही वोह एक आम ओंरत बनकर सबकी बातो का काट  पाती . क्यों नहीं  सबके सामने कुछ और  पीछे कुछ और बन जाती हैं  क्यों आज वोह अकेली हैं माँ के इस दरबार मैं . क्या खुद को बदल डाले या इस मोहल्ले को या फिर खुद मैं शक्ति बन जिए . डोल गया आज उसका मन का विश्वास ............... जार जार रोता रहा आज झुमकी  के मन का कोना ..........साथ ही हर उस ओंरत के मन का कोना जो खुद मैं जीना चाहती हैं  और ढूढ़ रहा हैं अपने अच्छे होने के सवाल का जवाब ................................