योगदान देने वाला व्यक्ति

4 मार्च 2013

आखिरी फैसला


"दुनिया मैं अगर आये हैं तो जीना ही पड़ेगा जीवन हैं अगर जहर तो जीना ही पड़ेगा "
ऍफ़ एम् पर गाना बज रहा था अपने अँधेरे कमरे के एक कोने में बिस्तर पर ओंधी पड़ी सुमन के आंसू थमने का नाम ही नही ले रहे थे .. एक अजीब सा आक्रोश एक , अजीब सी घुटन कुछ न कर पाने की विवशता उसको अपने चारो तरफ लपेटे थी 
एक प्राथमिक विद्यालय की सहायक अध्यापिका सुमन जब स्कूल मैं बच्चो को हिम्मत और बहादुरी का पाठ पदाती थी तो एक जोश भरी आवाज़ निकलती थी अन्याय का सामना करने की सीख देती सुमन अपने ही घर मैं किसी अन्याय के विरोध नही कर पाती थी 
कितनी चाह थी उसको कि पढ़ - लिख कर डॉ बने परन्तु घर के सीमित साधनों ने उसके सपनो की उड़ान को सिर्फ कल्पनाओ में ही खुश होने दिया और न चाह कर भी पिता ने उसको बी। टी। सी। करायी के सरकारी नौकरी मिलेगी भविष्य सुरक्षित रहेगा .
देहरादून शहर से बहुत दूर सहिया के पास बहुत ऊंचाई पर अलसी ग्राम में उसको पहली पोस्टिंग मिली ।मैदानी इलाके की सुमन को इतने ऊँचे पहाड़ पर जाना ही बहुत मुश्किल लगा ,परन्तु पिता के दबाव और सरकारी नौकरी की सामाजिक इज्जत की वजह से उसको जाना पढ़ा \ कितना अकेलापन सा लगता था उसको वहाँ । सुमन माह में एक बार देहरादून आती थी। धीरे धीरे उसने अलसी में  मन लगा लिया ।विद्ध्यालय परिसर में ही एक कमरे में रहकर उसने ग्राम की सब बड़ी और समवयस्क महिलाओ से मित्रता कर ली \समय पंख लगा कर उड़ने लगा \ पहाड़ जितने ऊँचे होते हैं वहाँ रहने वालो की उम्मीदे उतनी ही न्यून . कम में ही खुश रह जाने वाले भोले से लोग कितनी जल्दी अपना बना लेते हैं यह वहाँ  रहने वाले ही जान सकते हैं ।समय बीत रहा था साथ ही उम्र भी हर बरस नए पायदान पर पांव रख देती थी . छुट्टियों में देहरादून जाकर लम्बे समय तक रहना और 4 छोटी बहनों के साथ उनकी छोटी छोटी इच्छाए पूरी करना उसके अतृप्त मन को संतुस्ष्ट करता था ।
                                                                             माँ- बाबा को उसके विवाह के लिय उचित वर की तलाश थी राजीव अपने परिवार के साथ उसको देखने आये . सांवला सा लम्बा कद- काठी वाला राजीव उसको एक नजर में ही अपना सा लगा था उस पर उसकी केन्द्रीय सरकार के आधीन नौकरी घर भर के लिय सबसे बड़ा आकर्षण थी ।घर /परिवार के साथ सब आस- पास के लोग उसके भाग्य को सरहाने लगे ।
                                       सास बलाए लेते नही थक रही थी अपनी गोरी चिट्टी चाँद सी बहु की . अब तो सुमन को भी रश्क होने लगा अपनी ही किस्मत से जैसे जिन्दगी का सब अधूरापन ख़तम होने को हैं . कांवली रोड के नाथ पैलेस में धूम धाम से विवाह हुआ . पति ने कुछ पैसे देकर कुछ सिफारिश लागाकर उसका ट्रांसफर सहसपुर करा लिया . रोजाना बस से जाना स्कूल ख़तम होते ही लौट आना 
                                              जिन्दगी अपने आप चलने लगी थी । बहुत खुश थी सुमन राजीव को पाकर ,परन्तु समय के साथ साथ सास मांजी का लहजा बदलने लगा के विवाह को आठ माह होगये अभी तक कोई खुश खबरी ही नही < माँ बन ना हर नारी का सपना होता हैं सुमन भी माँ बन न चाहती थी उसका भी मन करता था के उसकी गोद में भी एक प्यारा सा बच्चा हो जब भी वोह इन ख्यालो में खो जाती तो उसको अपनी बाहों में एक प्यारी सी बिटिया ही दिखती थी 
                                               इश्वेर ने एक दिन उसकी पुकार सुनी और फिर से सुमन घर भर की रानी बन गयी। उसके खाने पीने से लेकर स्कूल आने जाने तक का इंतजाम नए तरीके से किया गया अब घर के बाहर से " सूमो ' उसको लेकर जाती और घर के बाहर ही छोडती थी । बसंत- विहार की सड़को पर सैर करती सुमन को अपना जीवन स्वर्ग सा लगता सास मांजी अपने आने वाले पोते के लिए ऊन लाकर मोज़े बुन रही थी सब उत्साहित थे समय आने पर  उसको आस्था नर्सिंग होम लेजाया गया लम्बी प्रसव पीड़ा के बाद उसने एक कन्या को जन्म दिया और मानो गुनाह कर दिया सबके चेहरे मुरझा गये , राजीव भी थोडा चुप हो गये यंत्रवत अपने काम में लगे रहते , बिटिया रूचि अगर र्र्र्रोती भी तो कोई जल्दी से उसको उठाने वाला भी नही था 
समय बीत रहा था . मैटरनिटी लीव ख़तम होने वाली थी अब बिटिया को कौन देखेगा यह सोच कर सुमन ने 2000 में एक महिला को रूचि को सम्हालने का काम दिया सरल स्वाभाव की ममतामयी मोनिका सुमन की सम्व्यसका थी ।उसकी अपनी भी एक बेटी थी जो 5 बरस थी और स्कूल जाती थी मोनिका के सहारे बेटी को छोड़ कर स्कूल जाती सुमन अब निश्चिन्त थी  देखते ही देखते रूचि 9 माह की हो गयी थी उसकी आँखों में माँ को देखते ही चमक आ जाती थी . परन्तु सुमन की तबियत कुछ ठीक सी नही थी हर वक़्त थकान भूख न लगना जी मिचलाना . सुमन को घबराहट होने लगी . अभी तो रूचि बहुत छोटी हैं क्या एक बार फिर से वोह ......... ओह!!!! अब क्या करे ।आजकल इस बात का पता करने के लिय हॉस्पिटल जाना जरुरी नही टी . वी ने इतना जागरूक बना दिया की एक स्ट्रिप लाओ और घर में ही पता लगा लो कि गर्भ हैं या नही . सुमन को वोह 2 पल जिन्दगी के सबसे भारी पल लग रहे थे ख़ुशी भी भीतर से तो एक अनजाना डर भी । रिजल्ट सकारात्मक देख कर उसको घबराहट होने लगी की  राजीव का न जाने क्या रिएक्शन होगा और मांजी ...उनकी सूरत यद् करके सुमन  के हाथ -पैर ही कंप कापने लगे 
                                                                     राजीव ने जैसे उसके फिर से गर्भ धारण की खबर सुनी तो ख़ुशी से फुले न समाये . जैसे उन्होंने कोई किला जीता हो एक पुरुष की जिन्दी का सबसे बड़ा क्षण  होता होगा जब उसको पपात चलता होगा कि  वोह पिता बन ने वाला हैं  एक नए जीव का आना सुखद ही लगता हैं  मांजी ने भी ख़ुशी भी जाहिर की परन्तु  उनके तीखे शब्दों ने राजीव के मन में एक संशय भर दिया कि  "इस बारी चेक करा लेना ,कही इस बार भी लड़की ही न जन दे तुम्हारी लाडली बीबी । बिना बेटे के तो स्वर्ग भी नही मिलता । आजकल वोह जमाना तो हैं नही के बेटे के इंतज़ार में 5-5 लडकिया जन दो . अब ख्याल  रखना कही अपना माँ का इतिहास न दोहरा दे यह लड़की हमारे घर में भी और तू तमाम उम्र बेटियों के ब्याह के लिए पैसा पैसा जोड़ता रहे ""


राजीव की अल्प बुद्धि लड़के लड़की का फर्क तो समझ गयी परन्तु यह नही जानपाई कि  लडकिया भी जिन्दगी में उतना ही महत्त्व रखती हैं जितना की एक लड़का . अब राजीव सुमन पर दबाव बनाने लगा की हमें पहले टेस्ट करना होगा कहा से आएगा दो दो बेटियों की पढाई से लेकर विवाह तक का खर्चा , सुमन ने बहुत कोशिश की परतु उसकी आवाज़ नक्कारखाने में तूती सी रह गयी आखिर टेस्ट कराना  ही पढ़ा और उसकी डॉ ने " जय माता की " कहकर जैसे वज्रपात कर दिया राजीव और मांजी पर .... अब सबके सुर बदल गये।।समाज की , पैसे की , अगले लोक-परलोक की दुहाई देकर उसे इस गर्भ से छुटकारा पाने के लिय मजबूर किया जा रहा था। अपनी माँ के पास जाकर उसने उनका संबल और सहारा चाहा तो माँ के आंसू उसकी मज़बूरी बयां कर गये ,5 बेटियों की माँ कैसे उसका सहारा बनती जो खुद पति के सामने एक शब्द नही बोल पाती थी 
                                                                कितनी मजबूर हो जाती हैं ना नारिया!!! कहने को कहा जा सकता हैं कि लड़ जाती अपनी अजन्मी संतान के लिय , एक माँ अपने बच्चे के लिए कुछ भी कर सकती हैं परन्तु सच एक दम अलग होता हैं यह समाज पितृ प्रधान हैं मायके का संबल न होतो स्त्री कुछ नही कर पाती बचपन से पिता और भाई के आधीन रहने वाली सहमी सी लड़की सब विवाह के बाद पति के घर जाती हैं तो जाने - अनजाने वोह उसकी जिन्दगी पर हावी हो जाते है और स्त्री उसे प्यार समझ बैठती हैं और वही प्यार जब उसकी जिन्द्दगी के हर फैसले करते हैं तो उसे घुटन होने लगती हैं परन्तु उस घुटन से निजात पाने के लिय विद्रोह करना सारे समाज से खुद को अलग करना होता हैं । किताबो में नारी स्वतंत्रता की बाते लिखना और अपनी जिन्दगी में उनको ढालना अलग अलग बाते है जो ऐसा कर पाती हैं उनका बचपन या तो बहुत सुखद होता हैं या वोह जिनके लिय यह सब बाते करना फैशन होता हैं या फिर वोह महिलाये जिनमे आग होती होती है समाज में लड़ मरने की ,लोहा बना लेती हैं खुद को .. बचपन से पिता की एक ऊँची आवाज़ पर डरने - सहमने वाली लड़की ससुराल में भी मान्यताओ रिवाजो और परम्परा के नाम पर चुप रह जाती हैं या दबे स्वर में किया गया उसका विरोध कोई माने नही रखता हैं
                                                    आज आखिर टूट गयी सुमन . हार गयी उसकी ममता इस समाज के सामने . एक नारी ने ही उसके नारीत्व का अपमान कर आने वाली नारी का कतल करा दिया वोह भी एक नारी के ही हाथो से .किसी को भी जरा भी अपराध बोध नही सिवाय सुमन के ।
उसकी जार जार बहते आंसुओ का किसी की आत्मा पर कोई फर्क नही पढ़ रहा था ।कौन कहता हैं कि  कतल सिर्फ गरीबी की वजह से होते हैं कुछ क़त्ल ऐसे होते हैं जो किसी को अपने होने की खबर भी नही होने देते अम्मा जी गुड का हलवा बनाकर रख गयी थी सिरहाने . जिसे खाने का भी मन नही किया सुमन का ।
                                                                                    अचानक तेज आवाज़ ने सुमन का ध्यान भंग किया और रूचि घुटनों चलती हुए उसके पलंग के पास खड़ी थी रूचि का मन भीग गया .. कम से कम जो आज मेरी झोली में हैं उसको तो सम्हाल लूँ . उसने मोनिका को आवाज़ लगायी कि  रूचि के लिय कुछ खाने के लिय ले आओ ।अब सुमन ने भी मूक प्रतिशोध लेने की ठान ली . उसे याद आया कि  अलसी में एक बूढ़ी मांजी ने कभी बताया था कि फलां जड़ी- बूटी खाने से नारी बंजर हो जाती हैं तो बस अब वोह और संतान ही नही जन्मेगी , कर ले कोई कोशिश जितनी चाहे ...कम से कम अपनी उस अजन्मी बेटी की आत्मा को तो न्याय दे पायेगी  ............मन ही मन सोचती सुमन के मन बंधन ढीले पढने लगे
                                       मोनिका ने केले काटकर उनके सामने रख दिए और बोली दीदी अब मैं नही आ पाऊंगी क्युकी मैं पेट से हूँ मेरे पति ने कहा हैं कि अपना ख्याल रखना ज्यादा जरुरी हैं उसने शाम को ओवर टाइम काम ले लिया हैं अब आप रूचि के लिय कोई और आया ढूढ़ ले ! 
" तुमने टेस्ट नही कराया , अगर इस बार भी लड़की हुए तो ?"
"नही दीदी अब चाहे लड़का हो या लड़की सब अपनी अपनी किस्मत लेकर आयेंगे . लड़के कौन सा आज चवर ढुलाते हैं दिल्ली वाले बस कांड को ले लो आज उन लडको की माँ उनको पैदा करने का अफ़सोस करती होगी , मुझे दूसरा बच्चा चाहिए अब चाहे बेटा  हो या बेटी कम से कम आगे जिन्दगी में  एक दुसरे का साथ तो बना रहेगा उनका , यह टेस्ट - वेस्ट तो आप जैसे पढ़े  लिखे लोगो का ही काम होता हैं "
                                                    मूक अवाक् सी सुमन उसका मुँह  देखती रह गयी . कितनी सच्ची बात कह गयी न मोनिका .कल 8 मार्च हैं और  सुमन का जन्म दिन और महिला दिवस  भी और उसने सोच लिया कि अबकी बार जरुर गर्भ धारण करेगी परन्तु अबकी बार किसी के दबाव में नही आएगी और अपने बेटी के लिय उसका सगा भाई या बहन जो भी होगा ले कर आएगी . समाज में एक छोटा सा उसका कदम ही उसकी बेटी को उसकी जिन्दगी में सफल बनाएगा वरना कल उसकी बेटी भी इसी तरह बिस्तर पर अपनी अजन्मी बेटी का अफ़सोस  मानती रहेगी ......................और खुद को कोसता रहेगा उसके मन का भीगा कोना ........ 

14 जनवरी 2013

Sanskaar

आज फिर माँ ने फ़ोन छीन लिया . जीनत का सन्देश आया होगा , पता नही माँ को क्या हो जाता हैं जब भी सेल फ़ोन में सन्देश को पढने लगता हूँ माँ अचानक कमरे में आ जाती हैं । उम्र हो गयी माँ की जितना भी खुद को प्रगतिशील कहती रहे अंदर से दकियानूसी विचार ही होंगे न । मेरे सब दोस्तों को देखो सबकी कोई न कोई लड़की दोस्त है मुझे तो माँ किसी लड़की से बात करते भी देख लेगी तो बेहोश हो जाएगी कि 
"क्या यह संस्कार दिए हैं मैंने "। 
"पढ़ा मत कर बस जब देखो लडकियां ।" 
अब आजकल माँ को पता नही क्या हो गया हैं जब देखो मुझे भाषण देती रहती है कि  लडकियों से लड़ा मत कर, ज्यादा बात न किया कर ,बस पढाई में ध्यान लगाया कर ,अच्छा बच्चा बन
कितना अच्चा बच्चा बनू /
 जब से यह दिल्ली में   वोह  दामिनी वाला कांड हुआ हैं सबकी मम्मियां बदल गयी हैं  उस पर से यह मीडिया वाले !!
अखबार में शोर मचा  हैं कि  माए अपने लडको मैं संस्कार नही भरती  ! अब संस्कार भी क्या कोई  दवाई हैं जो माँ  हमें खिल देगी ।हम ऐसे काम नही करेंगे  ।अब हम थोरे ही गलत हैं।  अब उन 6 लडको ने जो किया उसका खामियाजा हम क्यों भुगते ?हां अब दोस्तों मैं लडकियों को लेकर हसी -मजाक तो चलता ही हैं पर इन मम्मा लोग को कौन समझाए ?
                                                                 अब कल परवीन की माँ ने उसको ऋचा का मजाक उड़ाते सुन लिया तो बरस पढ़ी ।अब उन्होंने सिर्फ उसको सुना ,उधर से ऋचा क्या क्या बोल रही थी, आंटी को नही पता चला था ।अकेले परवीन ही परेशान नही था क्लास के सारे लड़के लडकिया परेशान थे। परसों अभी की जन्मदिन पार्टी सिर्फ इसी वज़ह से दिन में रखी  गयी क्युकी किसी भी लड़की की माँ उनको शाम 8 बजे तक बाहर रहने की अनुमति नही दे रही थी और किसी भी लड़के की माँ शाम की पार्टी में लडकियों को बुलाने के पक्ष में नही थी  ! अब यह क्या बात हुए ?जब हम क्लास मैं पड़ते हैं तो क्या हम यह सोच कर पढ़ते है के मैं लड़का हूँ यह पाठ पढू और यह लड़की . कितनी गलत बात हैं न !!!!?
:"सोनूऊऊऊउ "
लो हो गयी शुरू मेरी मदर इंडिया अब होगा इनका प्रवचन शुरू "
झुन्झुलाते हुए सुनील ने सामने पढ़ी किताब को खोल लिया और पढने का बहाना बनाने लगा
माँ आई और ढूध  का गिलास रखकर प्यार से सर पर हाथ फेर कर चली गयी
"दूध का गिलास हुह जब देखो यह खा ले वोह खा ले "
. " कभी मुझे अपनी जिन्दगी तो जीने नही देती .
यह फेसबुक ने भी माँ लोगो को बिगाड़ दिया है पता नही कैसे कैसे सहेलियां  बना लेती हैं खुद तो अनजान दोस्त बना लेगी और हम हैं कि  जान पहचान वाली लड़की के साथ स्कूटर पर भी कही नही जा सकते . जब मैं बड़ा हो जाऊँगा न अपने बच्चो को जो चाहे करे करने दूंगा . 
नही पीना मुझे ढूध्ह ."
सोचते सोचते सोनूका दिमाग कहा से कहा पहुच गया  यह उम्र ही ऐसे होती हैं कब कोन  सी बात पर चीड़  जाये कहा नही जा सकता । किसी भी बात पर उनको अपना स्टैंड सही लगता हैं  किसी भी बात को गलत कहा जाए तो  बहस करने को तैयार । उल्टा जवाब देने से मना  करो तो बोलेंगे  माँ हम क्या हम अपनी बात भी नही कह सकते , आप तो बस हमें डांट कर चुप करा देती हो ।अब बच्चे  हैं न सोचो में कहा से कहा तक पहुँच जाते हैं और वक़्त बेकार हो रहा हैं इसका उनको भान ही नही होता
"पापा आ गये पा आ गये "
लवलीन की आवाज़ सुनकर सुनील भी अपने से बाहर की तरफ आया
" अरे वाह ! पापा यह क्या गिफ्ट लाये हो आप !"
"बच्चे मेरा प्रमोशन हो गया हैं "
"आज दफ्तर में  समारोह था उसमे मुझे यह उपहार मिला हैं "
"पापा मैं इसको खोलू?"
"हाँ बच्चे आप इसको खोल कर देखो और अपनी माँ को दिखाओ "
अर्राए !! यह सब क्या हैं
"पापा आये नही के तुमने उनकी तलाशी लेनी शुरू कर दी चलो जाओ यहाँ से , पापा को आराम करने दो "
 उफ़ यह मम्मी भी न !!!!
मन में गुस्सा लिए सुनील अपने कमरे की तरफ  बढ गया
यह मम्मी भी न जब देखो पापा पर अपना एकाधिकार जमा लेती हैं
"दिन भर इनकी किट्टी पार्टी वाली सहेलियों के फ़ोन आते हैं फेस बुक तो खुला ही रहता है आते - जाते झांक लेती हैं किसने क्या लिखा और शाम होते ही पापा पर इनका एकाधिकार यह तो अच्छी बात हैं लवलीन हैं जो उसके साथ खेल लेता हूँ थोड़ी देर
टी।व् भी कुछ देर ही देख पता हूँ  उसकी मेहरबानी से  वरना माँ को तो मुझे दुनिया का सबसे अच्छा  बच्चा बनाने का मैडल लेना हैं "
अब  होम वर्क कर न होगा  कल सुलेकना का जन्म दिन हैं स्कूल मैं ही सबके लिय बर्गर और केक लेकर आएगी अगर माँ को बताया तो कहेगी की 
"क्यों? अपने घर का खाना कहो "
ब्लाह्ह ब्लाह्ह ब्लाह्ह 
कितना बोलती हैं यह माँ लोग "






पापा!!!
सर पर प्यार भरा स्पर्श पाकरहोमवर्क में  मग्न  सुनील का चेहरा खिल गया । पापा के हाथ में खाने की थाली थी . हाथ से एक एक कौर तोड़ कर खिलाते हुए पापा ने ढेरो बाते की
"पापा ! एक बात बताओ क्या लडकियों से लड़ना गलत बात हैं "

"नही बेटा !!!क्यों गलत ! जैसे तुम अपने लड़के दोस्तों  से लड़ते हो वैसे ही उनसे भी लड़ो न वोह तुमसे कमथोडे  ही हैं न "
पापा हस पढ़े
उनको माँ याद आगयी होगी न
"पापा फिर माँ क्यों कहती हैं अब लडकियों से ज्यादा बात मत करो उनको दोस्त नही बनाओ"
 कल सिम्मी आंटी भी कह रही थी के जिस लड़की के लिय दिल्ली में धरना प्रदर्शन हो रहा हैं वोह एक दोस्त के साथ घूमने गयी थी अब  तो बाबा अपने लडको को ही लडकियों से दूर रखो" ऐसा क्यों पापा
क्या अब जीनत का दोस्त नही रहा मैं ? वोह मेरी गर्ल फ्रेंड थोड़े ही है

बच्चे की आँखों में जब सवालो का तूफ़ान उठ'ता हैं तो उसको शांत करना कितना मुश्किल होता हैं ..... आजकल के बच्चे कितने मोर्चो पर लड़ रहे हैं पढाई का बोझ , अच्छे नंबर लाने की होड़ , घर में तनाव की हट आहात उनको परेशान  और   उनको कमजोर बना देती हैं उस पर यह टी।वी और यहमाता -पिता  का फेस बुक प्रेम बच्चो का  रहा सहा टाइम भी उन्होंने ले लिया
सर पर हाथ फेरते हुए सुनील की आँखों में झांकते हुए पापा बोले
"बेटा  दुनिया में जितने भी साधन बने हैं सब मनुष्य की सहूलियत के लिए बने है परन्तु हमने ही  उनको विलासिता बना लिया हैं सबका अब दुपयोग हो रहा हैं आपको सेल फ़ोन दिया गया था की आप जहाभी जाओ हमारी पहुच में रहो आपको कोई भी जरुरत हो आप हमें बुला सको क्युकी अब वो जमाना नही रहा के कोई अजनबी से सहायता ली जाए या वोह सहायता कर भी देगा उसकी गारंटी नही । लेकिन आप सारा  समय व्हाट'स उप पर लगे रहते हो या दोस्तों के साथ संदेशो  का आदान-प्रदान में !इसी तरह जिस तरह का व्यवहार आप अपने लड़के दोस्तों से करते हैं उसी तरह का व्यवहार अपनी लड़की मित्रो से रखो इस उम्र में बहुत आच्छा  लगता हैं विपरीत लिंगी का अपने पास होना , तुम लड़कियों  से दोस्ती रखो परन्तु याद रहे की  हर रिश्ते की एक मर्यादा होती हैं हमें हमेशा अपनी सोचो में भी याद रखना चाहिए की  जैसा हम सोचते है जरुरी नही दूसरा भी ठीक वैसा ही हमारे लिय सोचता होगा इस लिय सबकी सोच की इज्ज़त करनी चाहिए  और किसी के भी स्पर्श को पहचान न चाहिए  न तो किसी को खुद को स्पर्श करने दो न ही किसी को भी स्पर्श करो . भगवन ने हमें लड़का या लड़की बनाया तो हमें दुसरे लिंग की भावनाओ का सम्मान करना चाहिए ।"
                                                          " माना आज तुम्हे एक लड़की बहुत ही प्यारी से लगने लगी हैं तुमको उसका साथ हर वक़्त पसंद हैं तुम दिन में 10 सन्देश उसके सेल पर भेजते हो तो क्या होगा !! तुमको तो वोह पसंद हैं परन्तु उसको तुम न पसंद हो तो या उसको तुम्हारे संदेशो से कुछ फर्क नही पड़ता या उसकी परिवार को नही पसंद होगा यह सब आब उस लड़की को आपकी वज़ह से कितनी परेशानिया होंगी न ..क्या आप चाहोगे के जिसे आप पसंद करते हैं के वोह परेशान हो तो उसकी ख़ुशी के लिय अपने चारो तरफ एक सीमा बनाओ के कोई भी मित्र को चाहे लड़की हो या लड़का न तो हद्द से ज्यादा उसके पीछे पढो न उसको नेगलेक्ट करो बस उसकी शक्सियत को इज्ज़त दो आगे जाकर देखना जब तुम जिन्द्दगी में कुछ बन जाओगे तुम्हारे अच्छे नो आयेंगे तुम कक्षा में आल राउंडर बनकर आसेम्बली मैं खड़े होगे तो सब चाहेंगे के तुमसे दोस्ती करे "
पापा पर वोह जो दिल्ली वाली लड़की थी उसके साथ जो लड़का  दोस्त था उसने गलत किया था  उसके साथ रहकर /जाकर "....... सोनू ने झिझकते हुए पुछा
"नही बेटा  !!!वोह बहुत बहादुर था उसने कुछ गलत नही किया था द्द्दो दोस्त है एक साथ कही जाकर वापिस आ रहे थे बस कुछ राक्षस जैसे लडको ने उनके साथ गलत किया था इसका यह मतलब नही है कि  सब लड़के गलत हैं  न ही  आप गलत हो कि आपको अब लड़की से बात नही करनी ."पापा ने प्यार से सर पर हाथ लगते हुए कहा
"फिर मम्मा क्यों कहती हैं के अब लडकियों में ध्यान न दिया करो "
 "सही तो कहती हैं  आपकी पढाई की उम्र हैं लड़की को दोस्त मानो मनोरंजन का एक साधन नही
और बच्चे !  मम्मी भी एक लड़की है न
अब जब उस लड़की के साथ इतना सब कुछ बुरा हुआ तो अंदर तक उद्वेलित है
उनको बहुत गुस्सा हैं सब पर, पर हम पर नही तुम पर नही वोह हमारी हैं न"  आँखों में आँखे डाल कर पापा ने समझाया
उनको लगता हैं के समाज में बदलाव हो परन्तु कैसे नही जानती . हम दोनों है न हम आपकी मम्मी को कभी ऐसा मौका ही नही देंगे कि  उनको लगे कि  लड़के लडकियों से गलत व्यवहार करते हैं आपका फ़ोन भी उन्होंने जीनत के सन्देश के लिय नही छिना था उन्होंने आपका फ़ोन इस लिय लिया था क्युकी आपके फाइनल परीक्षा पास आरहे है बस इसी लिय 
                         बस उनका तरीका गलत था सारा दिन अखबार , नेट टी।वी पर देख देख कर उनका मन आक्रोशित हो गया हैं अब हमको ही उनको समझना है न "
सुनील का बल मन सोच में पढ़ गया हाँ पापा सही तो कह रहे है मम्मा के मन में परेशानी होगी तभी गुस्से में बोल गयी मुझे वैसे तो है न मेरी प्यारी मम्मा 
 ओके अब मैं मम्मी  को कभी यह महसूस नही होने दूंगा कि
 हर लड़का गलत होता हैं और उनका प्यारा बेटा बनूगा  कमरे सेबाहर दौड़ लगते हुए सुनील जोर से चिल्लाया
"ंंमाँ आआंंआआआआआआआआ
सुनो कल मेरी एक दोस्त का जन्म दिन हैं कोई गिफ्ट दो न उसके लिय .. 
 सब स्कूल मैं ही जन्मदिन मनाएंगे  क्युकी सबको पढना भी है न और हाँ आप मेरा सेल फ़ोन भी अपने पास रख लो जब कही जाऊँगा आप से ले लूँगा "
 पापा परदे के पीछे से देख रहे थे  की बच्चे कितने कोमल होते हैं माँ समझाए या पिता . संस्कार देने से आते हैं समझाने से नही अनदेखी करने से नही 
 आँखों में आंसू लिय पत्नी को देखकर भीग गया उनके मन का भी एक कोना ........................................

18 दिसंबर 2012

Maa ki Najar se

अम्मा!!!!! अम्मा!!!!!! 
फ़ोन पर किसी की बात सुनकर रमेश  जोर से चिल्लाया ......आधी रात को कोई बुरा सपना देख लियो का ? यह लड़का भी ना , रात  भर देर तलक पढता हैं  फिर सुबह मुंह ढापे पढ़ा  रहता हैं .मीना की माँ ने रजाई एक तरफ सरकाई  और  पलंग   के पास चप्पल खोजने लगी .तब तक रमेश अम्मा के पास आ पहुंचा .उसकी बदहवासहालत देख कर अम्मा का दिल जोर से धड़क   उठा   "क्या हुआ?"
"अम्मा ! वोह  .वॊऒऒऒऒऒऒऒ "
 "क्या वॊओ वॊऒओ किये जा रहे हो क्या हुआ "
 "अम्मा! वो जीजी जी ....जी इ इ इ इ इ "
 "हाय रे! मेरी फूल सी लाडो  को क्या हुआ/" 
 "अम्मा वो हस्पताल में हैं "
 "हाय रे   !!!"
 "लग गयी होगी ठण्ड  मरजानी दिल्ली की ठण्ड भी तो।। "
" कित्ती बार कहा इस लड़की को  गरम कपड़े पहना कर पर  यह आजकल की लडकियाँ " ! 
"इस बार तो लड्डू भी न भेजे मैंने बनाकर "
 "पिछली बार भी कित्ती खांसी हुई थी ओर  बुखार भी .. "
 अम्मा थी कि बुदबुदाये    जा रही थी  खुद ही खुद पर  कभी खुद को कोस रही  थी  कि  इस बार लड्डू क्यों नही बना कर भेजे 
 खुद डाक्टर बन रही हैं पर इलाज तो माँ के ही काम  आते हैं ना . चार किताबे पढ़ लेने से  जिन्दगी पढनी नही आ जाती इन बच्चो को 
 अलमारी से अपने गरम कपडे निकल कर बैग में ठूंसती  अम्मा अनजान थी कि रमेश अपने बाबूजी के कान में क्या कह रहा हैं उन्हें तो अपनी फूल सी मीना याद आ रही थी  कितनी मेधावी थी उनकी मीना . उनकी बिरादरी वालो ने बहुत चाहा  की कि अम्मा अपनी मीना का ब्याह कर दे अच्छा  घर बाहर देखकर , पर अम्मा को मीना का सपना पूरा करना था उसको डाक्टर बन ना था 
 4 साल देहरादून के एक पैरामेडिकल  से उसने पढाई की  अब उसको इंटर्न शिप करनी थी 
 "देहरादून में भी बहुत स्कोप हैं  परन्तु दिल्ली में इंटर्नशिप करने से अच्छी नौकरी मिलेगी  '...मीना की बात से अम्मा ने उसको दिल्ली भेज दिया 
 कितनी खुश थी लाडो .परसों ही तो फ़ोन पर बात की उसने के अम्मा आप परेशान मत होना मैं  यहाँ ठीक हूँ 
 जानती थी अपनी बेटी को  बहुत ही संस्कारी लड़की हैं  ऐसा नही कि उसने अपनी बेटी को नए ज़माने के साथ चलना नही सीखाया था  परन्तु उसकी बेटी ही इतनी गुणवान ओर संस्कारी थी कि कुछ भी करती थी तो माँ के संज्ञान में ...
 ना जाने कैसे होगी ?
  नहा कर जब बाहर आई तो देखा कि  रमेश के बापू भी तैयार होकर खड़े थे  कितने खिलाफ थे यह मीना के डाक्टर बन जाने के ...कि  जमाना बहुत ख़राब हैं  लड़की जात हैं ब्याह के अपने घर जाए वह जाकर जो मर्जी करे जितना मर्जी पढ़े ...आज बिटिया  की तबियत जरा सी नासाज हुई  नही कि  साथ चलने को तैयार हो गये . मीना की अम्मा मन ही मन मुस्कराने लगी ...... कार में बैठ  कर भगवन को  मन ही मन नमस्कार करके यात्रा शुभ हो की कामना करने लगी 


 सुबह के चार बजने को हैं सुबह  ट्रैफिक कम होता हैं फिर भी रमेश  ने कार तेज स्पीड से चलानी शुरू कर दी 
 शायद बहन की फ़िक्र हैं इसको भी  भगवन इन भाई बहन का प्यार हमेशा बनाये रखे  . उसने नजर भर कर रमेश के बाबूजी को देखा ... कैसा पीला लग रहा हैं चेहरा .... बेटी की फ़िक्र या इतनी जल्दी सुबह उठने की  वजह से ... जो भी हो जब बेटी का हाथ हाथो में लेंगे और वोह कहेगी कि   बाबूजी  ताश खेले  भाभो में हर बार की तरह इस बार भी मैं  ही जीतूंगी  तब देखना कैसे ंमंद मंद ं मुस्करायेंगे 
 कार तेजी से दौड़ रही थी साथ ही मन भी .... बस मीना की डाक्टरी  पूरी हो जाए  तो इसका ब्याह कर दूँगी  अगले साल ... छोटे छोटे नाती नातिनो के साथ खेलने का बड़ा  मन करता हैं .साथ वाली रामो जब अपने बच्चो संग मायके आती हैं और उसके बच्चे जब उसको भी गोरी  नानी  कहते हैं तो मन कही सुकून सा पाता  हैं कि  उसके नाती भी उसको गोरी नानी कहेंगे या आजकल के  माँ - बाप की तरह मीना भी उनको बड़ी मम्मा कहना सिखाएगी 
 सोचो के सागर में गोते खाती  मीना कब दिल्ली पहुँच गयी पता भी नहीं चला . कार सफदरगंज अस्पताल के सामने रूक गयी रमेश तेजी  से  रिसेप्शन पर पंहुचा  अम्मा सामने रखी कुर्सी पर  बैठ गयी 
 सुबह सुबह अखबार पढने ंका आनद ही कुछ और होता हैं . पहले पेज के तीसरे कलम में एक खबर पर नजर एक पल को रुकी " दिल्ली ंमें चलती बस में एक छात्रा से गैंग  रेप " 
"निगोड़े ,"क्या हो गया यह आजकल के बच्चो को ! लडकिया दिल्ली जैसे राजधानी में ही जब स्सुरक्षित नही तो गाँव  के दबंगों के सामने उनकी क्या हिम्मत !  मन ख़राब सा हुआ पढ़ कर ओर अखबार सामने रख कर  देखने लगी कि  रमेश  किदर गया ? 
 सामने से दो पुलिस वालियों के संग  रमेश आ रहा था "इसकी आँखे रोई सी क्यों हैं ?  माँ का मन आशंकित हुआ 
" अम्मा जी ःहिम्मत रखो  हम आरोपी को छोड़ेगे नही . "
"अरे हुआ क्या?????????????????"
" मेरी बच्ची को क्या हुआ ?"
"अरे रमेश!!!!"
" हाय मेरी बच्ची !"
 तेजी से कदम रखती वोह आई सी यू  की तरफ भागी जिधर  से रमेश आ या  था 
"हाय मेरी बच्ची  !!!तुझे भगवान् मेरी भी उम्र दे "
मन ही मन बलाए उतरती एक माँ की आँखों से आंसू बहने लगे 
रमेश के बाबु जी माथा पीट रहे थे 
 रमेश की आँखे खून के आंसू रो रही थी 
 पुलिस वाली ने हाथ थामकर उनको सब बताया 
( नही सीसा उड़ेल दिया उसके कानो में )
 वोह सब !!
 जिसको कभी कोई माँ- बाप नही सुन ना  चाहेगा 
 कोई भाई  इस दिन को देखने से पहले मर  जाना चाहेगा 
 अपनी हाथ की राखी उसको जहर लगने लगेगी 
 उसके सामने अखबार की वोह खबर घूम गयी 
 धच्च! से वोह जमीन पर गिर गयी 
 पूरी दिल्ली में सिर्फ मेरी बेटी !!!
.....
.
.
 अब माँ के हाथ जो उसकी सलामती की दुआ कर रहे थे 
  सोचने लगे कि  वो दुआ करे तो क्या? 
 सुन्न था  उसके लहुलुहान  मन का कोना 
 नीलिमा शर्मा 

10 दिसंबर 2012

Mayka ( मायका )

सोफे पर पीठ टिकाये  निशा ने आँखे मूँद ली . पर आँखे मूँद लेने से  मन सोचना तो बंद नही करता न .  मन की गति पवन की गति से भी तेज होती हैं . एक पल मैं यहाँ तो दुसरे ही पल सात समंदर पार .,
एक पल मैं अतीत के गहरे पन्नो की परते उधेड़ कर रख देती हैं तो दुसरे ही पल मैं भविष्य  के नए सपने भी  देखना शुरू कर देती हैं .  निशा का मन भी  उलझा हुआ था अतीत के जाल में .  तभी फ़ोन की घंटी बजी 
" हेल्लो "
"हाँ जी बोल रही हूँ "
"जी"
 "जी "
" जी अच्छा"
" में उनको कह दूँगी "
 "आपने मुझसे कह दिया तो मैं  सब इंतजाम कर दूँगी ""
 "विश्वास कीजिये मैं  आप को  अच्छे से अटेंड करुँगी आप आये तो घर "
" यह तो शाम को ही घर आएंगे इनका सेल  फ़ोन भी  घर पर रह गया हैं "
"आप शाम को 7 बजे के बाद दुबारा फ़ोन कर लीजियेगा "
 "जी नमस्ते "

                                                                                           फ़ोन रखते ही पहले से भारी मन  और भी व्यथित हो उठा  एक नारी जितना भी कर ले  पर उसकी कोई कदर नही होती हैं   सुबह सुनील से निशा की बहस भी  उसकी बहन को लेकर हुई  थी  यह पुरुष लोग अपने रिश्तो के प्रति कितने सचेत होते हैं ना  स्त्री के लिए घर  आने वाले सब  मेहमान एक से होते हैं  परन्तु पुरुषो के लिय अपने परिवार के सामने उसकी स्त्री भी कुछ नही होती,न ही अपना घर , खाने के स्पेशल व्यंजन  होने चाहिए , पैसे पैसे को दाँत  से पकड़ने वाला पति  तब धन्ना सेठ बन जाता हैं  पत्नी दिन भर खटती  रहे  पर  उसपर अपने परिवार के सामने एकाधिकार एवेम आधिपत्य दिखाना पुरुष प्रवृत्ति होती हैं 
                                                            सुनील की बहन  रेखा  सर्दी की छुट्टियाँ   बीतने के लिय  उनके शहर आने वाली थी  सुनील चाहता था कि  उनका कमरा  एक माह के लिए उनकी बहन को दे दिया जाए   निशा इस बात के लिए राजी नही थी  पिछली बार भी दिया था उसने अपना कमरा  दीदी को रहने  के  लिए .....
                                                                                                              दिन भर रजाई में पड़े रहना  पलंग के नीचे मूंगफली के छिलके , झूठे बर्तन , गंदे मोज़े  निशा का मन बहुत ख़राब होता था  काम वाली बाई भी उनके तीखे बोलो की वज़ह से उस कमरे की सफाई  करने से कतराती थी . निशा के लिए सुबह स्नान के लिए  अपने एक जोड़ी  कपडे निकलना भी मुश्किल हो गया था तब .. उनके जाने के बाद जब निशा ने अपना कमरा साफ किया तो तब जाना था  उसके कमरे से अनेक छोटी छोटी चीज़े गायब थी  उसके कई कपडे ,  बिँदिया , पलंग के बॉक्स से चादरे ....
 मन खट्टा हो गया था उसका पिछले बरस  कि  अबकी बार आएँगी तो इनको अपना कमरा बिलकुल नही दूँगी सुनील मान लेने को तैयार ही न था  इस बार उनकी बहन छोटे कमरे में   रहे .
"                                                        निशा का मन अतीत में  जाता हैं अक्सर . मायका तो उसका भी हैं  वोह कभी दो दिन से ज्यादा के लिए नही गयी  सुनील का कहना हैं ....
".रही थी न 22 साल उस घर में    
अब भी तुम्हारा मन वहां ही क्यों रमता है ? 
अपना घर बनाने की सोचो बस !!
अब यही हैं तुम्हारा घर ..."
अब .जब भी जाती हैंमायके तो  अजनबियत का अहसास रहता हैं वहां , माँ बाबूजी उम्र के उस पड़ाव पर हैं जहा उनके शब्दों का कोई मोल नही अब , जैसा बन जाता हैं खा लेती हैं निशा  . बच्चे अगर जरा भी नखरे करे उनको आँखे तरेर कर चुप करा देती हैं  चलते  हुए माँ मुठ्ठी में बंद कर के  कुछ रुपये थमा देती हैं  और एक शगुन का लिफाफा 4 भाइयो की बहन को  कोई एक भाई " हम सबकी तरफ से " कहकर थमा देता हैं  ............न कुछ बोलने की गुंजाईश होती हैं न इच्छा .

                                       किस्मत वाली होत्ती हैं न वोह लडकिया  जिनको मायका नसीब होता हैं  जिनके मायके आने पर खुशिया मनाई जाती हैं , माँ की आँखों में परेशानी के डोरे नही खुशी के आंसू होते हैं 
टी वी पर सुधांशु जी महाराज बोल रहे थे  बहनों को जो मान -सम्मान मिलता हैं   जो नेग मिलता हैं  उसकी भूखी नही होती वोह  बस एक अहसास होता हैं कि इस घर पर आज भी मेरा र में आज भी हक हैं 
 निशा ने झट से आंसू पोंछे ,  फ़ोन उठाकर सुनील को  उनके दूकान  के नंबर पर   काल किया 
 "सुनो जी , बाजार से गाजर लेते आना , निशा दी कल शाम की ट्रेन से आ रही हैं  गाजर का हलवा बना  कर रख दूँगी उनके चुन्नू को बहुत पसंद हैं   "
  कमरे की चादर बदलते हुए  निशा सोचने लगी  ना जाने रेखा दीदी  ससुराल में किन परिस्तिथियों में रहती होगी  कैसे कैसे मन मारती होगी छोटी छोटी चीजो के लिए  . शायद यहाँ आकर उस पर अपना आधिपत्य दिखा कर उनका स्व संतुष्ट होता होगा . कम से कम किसी को तो मायका जाना सुखद लगे और खुश रहे उसके मन का रीता कोना !!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!! 


 नीलिमा शर्मा 

17 नवंबर 2012

Asha

 ख्यालो में  अनेक रंग सजते हैं  कई सपने बुने जाते हैं , पर सपने सच कहा होते हैं .? सब   रंग रंगोली में सजा कर रख दिए थे अपने दामन में  बस एक रंग था फीका सा , जिसका रंग रोज बदलता सा  . आशा नाम की थी पर जीवन मैं सिर्फ निराशा ही निराशा . 18 दीवाली बीत गयी इस आँगन में .
 कहा गया था कि  हमारे घर की लक्ष्मी  बनेगी  . पर वोह अपने मन के आँगन की लक्ष्मी भी नही बन पाई  . देखती थी के सब कैसे आँगन सजाती हैं घर के नए परदे लाती हैं ,कोन  सा नया बर्तन आएगा घर में ,
 भाई दूज पर क्या उपहार जायेगा ननद के घर ,  दीवाली से महिना भर पहले से घर के सब खिड़की- दरवाज़े  साफ करती आशा   बस यही सोचती रहती  कि  कौन सी दीवाली होगी जब वोह खुद जाकर लक्ष्मी पूजन का सामान लाएगी .  खुद आगे होकर लोगो के घर जाएगी 
,                                                                           सिल्क की सारी पहन कर ,एक कृत्रिम मुस्कान के साथ  उसको चाय के कप के साथ बैठक  में बुलाया जाता हैं . कुछ नाम बताये जाते हैं जिनको वोह बिना देखे नमकार कर देती हैं  और उसको मठरी बनाने का आदेश मिलते ही बैठक से बाहर  आना होता हैं . एक जमींदार घराने की बड़ी बहू , कम पड़ी-लिखी आशा को कभी ऐसे आशा न थी कि   शादी के बाद वोह एक बंधुआ बहू होगी  जिसका काम होगा घर को सम्हालना जैसा आदेश मिले उसके अनुसार काम होना चाहिए अगर आदेश से इतर जरा भी काम  हुआ तो आशा की निराशा  कब लातो घूसों  से बदहवास हो जाये कुछ नही पता , बड़ी हवेलियों  में चीखे बाहर  नही आती घुट जाती  हैं तकिये के अंदर या साड़ी  के पल्लू में  .
                                                                             हाँ हाँ!!! दो बच्चे भी हैं पति भी कोई बलात्कारी होते हैं भला ! हक होता हैं उनका  , उसके  दो बच्चे हैं जो होस्टल से आते हैं तो उनके लिय माँ एक कुक होती हैं बस!! जो उनका पेट भरे ,जेब पिता के दिए नोटों से इतनी भरी होती हैं के उनको रिश्ते नाते निभाने की समझ नही होती  हर रिश्ता उनके लिय एक अवसर होता हैं जिसको कब कैसे भुनाना हैं अच्छे से जानते हैं वोह बच्चे 
                                                                             
 एल्बम के पुराने पन्नो को सहेजती  आशा फिर से खो जाती हैं  और रह जाता हैं  सिल्क की साड़ी  को तह लगाने का काम .........और आशा फूहड़ औरत हो जाती हैं .. . जिसे कुछ नही करना आता सिवा एक नौकरानी के काम  करने के अलावा . आज आशा  घर भर में नही हैं हैं सब तरफ ढूढ़ मची हैं    आज खाना जो नही बना , पर किसी ने  घर के पीछे वाली सड़क  के बाजु में गुजरती पटरी पर  नही ढूँढा 
एक नाजुक सी सपनीली आँखों वाली लड़की  नाम से आशा सिर्फ निराशा से जी रही थी  जिन्दगी ............. क्या आपने आस-पास देखा हैं उसको कही ?देखिये न अपने मन का कोना 

20 अक्टूबर 2012

Ab kya!!


"रमा यह सब क्यों हुआ मैंने कभी सोचा भी नही था ऐसा हाय रे मैं मर क्यों नही गया यह दिन आने से पहले!!!!!!!!!!!!!!! "
आंसू भरी आँखों से विकास ने रमा के झुर्रियो  भरे हाथो को थामा  और  लाचारगी से उसकी तरफ देखने लगा .
  कोने वाले कमरे के बिस्तर पर  कृशकाय  रमा   विकास के कपकपाते हाथो को थामे  टकटकी लगाये छत  को देख रही थी
                                                 याद आने लगे उसको वोह पल जब उसने एक दुल्हन बन इस आँगन की दहलीज़ पर पाँव  रखा था , 8 भाई-बहनों में  4 नम्बर की बहु थी वो ....तब जमाना ही अलग था . शादी तब सिर्फ पति से नही पूरे परिवार से होती थी .....पति से मन का मिलन  हो न हो देह का मिलन हो जाता था और पूरे परिवार से मन मिले न मिले  सर झुकाना पड़ता था  . बहुत ही अरमान लेकर उसने भी अम्माजी की देहरी पर माथा टिकाया था ........
                                                            अम्मा जी पूरे रॉब-दाब  वाली  बेहद खुबसूरत  महिला थी क्या मजाल थी कि  कोई बहु या बेटा  उनके सामने एक शब्द भी बोल जाये . चक्करघिन्नी सी घूमती  सब बहुए  दिन भर काम मैं लगी रहती  जिसका काम अम्माजी का जरा भी नापसंद आता उसका रात को पति से पिट जाना लाजिमी था उस घर मैं .... यह रोज का तमाशा था  बस सोचना यह होता था कि आज किसका नंबर लगेगा . किसी को किसी से कोई शिकायत नही किसी को किसी से कोई हमदर्दी नही थी  .साल दर साल परिवार बढता  गया जगह कम होने लगी तो अम्मा जी ने  सबसे बड़े बेटे का चोका अलग कर दिया  शादी के 5 साल बाद रमा को भी पति के संग चार बर्तन देकर "जाओ अपनी घर गृह्स्थी खुद बनाओ चलाओ "कह कर घर से बाहर  का रास्ता देखा दिया गया था
                                      कैसे एक कमरे मैं रमा ने अपने बच्चे पाले कैसे दिन भर लोगो के स्वेटर बन कर पैसे कमाए विकास को कुछ पता नही उसका काम था दिन भर दफ्तर मैं रहना उसके बाद अम्मा जी के घर हाजिरी ....लोटने तक बच्चे नींद में होते . कभी साथ बैठकर विकास ने दो मीठे बोल भी न बोले
                ओरत दिन भर काम कर सकती हैं हैं . कम खा सकती हैं एक जोड़ी  कपड़े मैं गुजरा कर लेगी बस शाम के वक़्त अगर पति दो मीठे बोल बोल दे . लेकिन यह बात हर पुरुष को कहाँ समझ मैं आती हैं .............जीवन का योवन वो दंभ मैं गुजर देता हैं कि  कि  मैं पुरुष हूँ  सृष्टि का रच्येता!!! ओरत तो सिर्फ जमीन हैं .जबकि वोह ज़मीन ही 9 महीने तक उसके बीज को अपनी कोख में अपने खून से सींचती हैं  और तभी उसको मिलता हैं  अपना वारिस ....और उस वारिस को  वोह गोद में लिए ऐसे खुश होता हैं जैसे सारा दर्द उसी ने झेला हो  और उस नारी की पीडा  को समझने के लिए उसके साथ तब भी किसी कोने वाले कमरे का अकेला सा बिस्तर होता हैं
                                                 रमा ने भी 4 बेटो को जना .खून का असर कहो या माहौल का बेटे बाप से भी सवा सेर निकले . बेटिया  थी 4 जो उसके दुःख को जरा समझती थी . अन्दर से अकेली रमा को कब दिल का रोग लगा कोई नही जानता था . दिन थे के गुजर ही रहे थे ....आज घर मैं कोई कमी नही न पैसे की न जगह की  बस कमी थी तो आज भी उस संवेदना की जो कभी इस घर के पुरुषो ने रमा को कभी दी नही .सब बेटे भी अब बीबियो वाले थे खुद चाहे आज भी बीबी को जूतों से पिट ले पर कोई उनको कुछ कहे तो एक दुसरे का सर फोड़ने को तैयार ...और आजकल की बहुये  तो माशाल्लाह ...........खुद काम  करे न करे .बेटो के सामने रमा को लपकती झपकती" कि  माजी
बेठो न हम हैं काम  करने को , आप आराम करिए न ."...और बेटो के  पलट जाने के ......."अरे मैं तो थक गयी हु माँ आप चाय तो बना लाओ .."........माँ नौकरानी बन काम करती .....
                                             उस सुबह हद ही हो गयी ..........पता नही कौन   सा शनि आज सजा दे रहा था  या पिछले जनम के बुरे करम होंगे कोई . सुबह चाय बनाते वक़्त रमा के काँपते  हाथो से ढूध  का पतीला गिर गया  थोड़ा  सा ढूध  पोते की बाह पर छींटे बनकर गिर गया .बच्चा बाल  सुलभ होकर जोर से चीखा .......... बेटे ने आव देखा न ताव ...माँ पर हाथ उठा दिया ........................ एक बेटे अपने बेटे का दर्द न देखा गया ............
                          अपने कमरे में रोती  रमा ने पूरा दिन खाना नही खाया  न ही घर- भर मैं कोई पूछने आया . दो दिन बाद विकास को ही सुध आई  सारी  बात जान  लेने पर उम्र के इस पड़ाव पर पहली बार उसका पौरुष जागा

  उसने जब बेटे से जवाब तलब किया तो ....जो नही होना चाहिए था वही हुआ ....................... अपने बूढ़े  बदन पर नील के निशाँ लिए और लहुलुहान आत्मा से विकास रमा के पास लौट  आया  
                                         इंसान दुनिया से हर कदम पर लड़ लेता हैं परहारता  हैं वोह सिर्फ अपनी ही संतान  के सामने !!  सारी  उम्र वोह खुद अपनी पत्नी को वोह सम्मान नही देता जिसकी हक़दार वोह होती हैं  तो बच्चे कैसे अपनी माँ को सत्कार करे जिसको उसने उम्र भर त्तिरस्कृत  होते देखा हो
                                               रमा का हाथ थामे विकास  खड़ा था उस चौराहे पर ..जहा सोच के सब रस्ते खंडित हो जाते हैं  कि  कहा क्या गलत हुआ ......................  और शून्य मैं  ताकने के सिवा कुछ भी नही रहता ................................................ और आज जख्मी था  आज दोनों के मन का कोना .........अपनी अपनी परिधि मैं .....................................................................

17 अक्टूबर 2012

Jhumki


आज फिर झुमकी रो पड़ी ............आंसू टप-टप बह रहे थे . अहसासों का कोर कोर मानो  लहुलुहान था , आखिर क्यों उसका हुक्का-पानी बंद कर दिया मोहल्ले वालो ने     
 मन के आंसू  धुधली छाया लिए  उसे बीते साल की यादो मे ले गये   ........ सब मोहल्ले वालिया  नुक्कड़ पर खड़ी थी      कभी इसकी कभी उसकी   बुराई की जा रही थी  . उसको कतई पसंद नही था यह सब करना  जब उसको सबने आवाज लगायी तो उसने आने से मना कर दिया   के घर में ढेरो काम पड़े  हैं मुझे ट़ेम नही यहाँ आने का     . बचपन से अपनी किताबो मे घुसी रहने वाली झुमकी मोहल्ले की सबसे ज्यादा पढ़ी लिखी ओंरत थी  . हर  वक़्त मोहल्ले के चोराहों पर आते जाते आदमियों की नज़रो का स्वाद बन'ने की अपेक्षा उसको सिलाई करना पसंद था     घर का हर कोना उसकी सुघड़ता   की गवाही देता था . छोटे से घर में अपने दो बेटो के साथ बहुत खुश रहती थी  हर  मिया-बीबी की तरह किसनवा से लड़ भी लेती थी  तो बच्चो की शरारत पर उनको पीट भी देती थी हर तरह से आम  औरत थी बस यह चौराहा   उसको पसंद नही था . धीरे धीरे मोहल्ले की ओरते जो कभी उस से बात करने मे फख्र महसूस करती थी  अब उसको घमंडी कहने लगी उसके सुथरे कपडे सबकी आँखों मैं खटकने लगे सबके मर्द" झुमकी को देख जरा "कहकर अपनी बीबियो    को चार बात कहने लगे थे . पिछले बरस उसने गीतली के घर कीर्तन मैं सुमनी को उसकी सास/पति  की बुराई करने से टोक दिया  तो सबने उसको स्पेशल ओंरत का तमगा पहना दिया  जैसे सास/पति  की बुराई  करना हर औरत   का  अधिकार हैं  अब किसनवा अगर प्यार करता हैं तो क्या हुआ अगर गलत काम पर गुरियता भी हैं  जब बख्त आता हैं तो झुमकी भी तो उसको खूब सुना देती हैं  यह बात हर औरत  को समझ नही आती सबकी सब अनपद औरत  नारी मुक्ति आन्दोलन की नेता बनी फिरती हैं एक का मर्द मारे सब इकठ्ठी हो जाती हैं खुसर-फुसर करने को .पर झुमकी ने न कभी किसी को बुलाया न कभी किसी के यहाँ चुगली करने गयी .बस यही से उसको घमंडी कहा जाने लगा धीरे धीरे सब  को लगने लगा के  यह हमारे जैसे क्यों नही      और   


                                              आज  अरसे बाद उसने अपने घर मे माता का कीर्तन कराया .............. दो चार बुजुर्ग औरते   आई बाकि कीर्तन मण्डली वालियों ने भी अलग ढोलक बजा ली  के  बहुत बनती थी न  बजा ले घंटी  मंजीरा अपने आप .............किसी ने नही सोचा शक्ति औरत में  खुद विराजमान  हैं .........क्यों इक दुसरे की दुश्मन बनी हैं वोह ...............  क्या कसूर रहा उसका . क्यों नही वोह एक आम ओंरत बनकर सबकी बातो का काट  पाती . क्यों नहीं  सबके सामने कुछ और  पीछे कुछ और बन जाती हैं  क्यों आज वोह अकेली हैं माँ के इस दरबार मैं . क्या खुद को बदल डाले या इस मोहल्ले को या फिर खुद मैं शक्ति बन जिए . डोल गया आज उसका मन का विश्वास ............... जार जार रोता रहा आज झुमकी  के मन का कोना ..........साथ ही हर उस ओंरत के मन का कोना जो खुद मैं जीना चाहती हैं  और ढूढ़ रहा हैं अपने अच्छे होने के सवाल का जवाब ................................