योगदान देने वाला व्यक्ति

7 अगस्त 2013

बात करोगी ना मुझसे

" मत करो ना मुझे इतनी रात  को फ़ोन । कहा था न मेरी तबियत ठीक नही हैं  और आपको कोई फर्क नही पढता  रूमानियत का आलम  इस कदर छाया हैं तुम पर के तुम न वक़्त देखते हो न  माहौल . बस सेल फ़ोन मिलाया  और कैसी हो तुम !!!!  क्या पहना हैं आज ??""
 अभी ३ महीने भी नही हुए थे कामिनी की सगाई को .और दिनेश  उसे देर रात  को रोजाना फ़ोन करता था 
अब कैसे कहे कम्मो कि उसे नही पसंद था ऐसी वैसी बाते करना  
"नाराज हो गया न  दीनू " अभी उसका फ़ोन आया था  कि "आपकी बेटी क्या किसी और को पसंद करती हैं जो मुझसे बात नही करती   बात करेंगे तभी तो एक दुसरे को समझ पाएंगे हम  और तुम हो कि  हमेशा अपनी ही दुनिया में  गुमसुम रहना पसंद करती हो "
माँ के गुस्से वाले शब्द सुन कर कम्मो मन ही मन ड र गयी थी  बड़ी मुश्किल से यह रिश्ता हुआ था वरना २ ९ साल की लड़की को कहाँ  अछ्हा  बिज़नेस  वाला लड़का मिलता  हैं ..पर उसकी द्विअर्थी बाते ............उफ़्फ़्फ़्फ़्फ़्फ़  
 सोचते सोचते  कम्मो की उंगुलियां  दिनेश का नम्बर मिलाने   लगी .....अब शादी तो करनी हैं  आदत बनानी होगी उसको ऐसे बातो की ........

11 जून 2013

लाइफ लाइन

"कितना बिजी रहते हैं आप " "मेरे लिए तो फुर्सत ही नही आपको " झुन्झुलाते हुए निमिषा ने फ़ोन बिस्तर पर पटक दिया 
 बात मुझसे करते हुए भी आँखे कंप्यूटर स्क्रीन पर अटकी रहती हैं मेरी बाते सुने बिना ही हाँ न का जवाब आता रहता हैं 
सुनील एक मल्टीनेशनल कम्पनी में मैनेजर हैं . एक तो प्राएवेट नौकरी उस पर इतने टार्गेट कैसे समझाए निम्मी को .

शादी के 17 साल बीत गये थे परिवार की जिम्मेदारियां पूरी करते करते कनपटी 
पर सफ़ेद बालो की चाँदनी बिखरने लगी थी एक छोटी सी कंपनी में छोटी नौकरी करते करते आज सुनील इतने बड़े ओहदे पर पहुँच पाया था तो सिर्फ और सिर्फ अपनी मेहनत और इमानदारी से कम करने के कारण 16 साल का किट्टू और 14 साल का बिट्टू अपनी अपनी कक्षा में अच्छे स्थान प्राप्त करते थे , माँ - बाबा सुख से अपना बुदापा बिता रहे थे निम्मी को अब फुर्सत के कुछ पल मिलने लगे थे तो उसके अरमानो ने भीउड़ान भरनी शुरू कर दी थी उसने घर पर खाली समय में पेंटिंग्स बनानी शुरू कर दी थी 
लेकिन कितनी बनाती . कुछ ही दिनों में उसकी बोरियतफिर से शुरू हो गयी अब उसका पूरा ध्यान घर -भर पर लगा रहता कौन क्या कर रहा हैं , कहाँ हैं बस सारा दिन यही उधेड़बुन में लगी रहती निम्मी । बच्चो को जरा देर हो जाए ट्युशन से आने में ,तो घर आँगन में चक्कर लगाने शुरू कर देती । माँ अगर दो से तीन बार किसी बात को पूछ ले तो हमेशा से हँसने वाली निम्मी अब चिडचिडा जाती बच्चे भी परेशान हो जाते कि माँ को हुआ क्या हैं ? अब स्कूल से आकर छोटी छोटी बाते माँ से शेयर करना उनको बोझ सा लगने लगा क्योकि क्या पता माँ किस बात पर कैसा रियेक्ट करे 

उम्र और व्यस्तता एक नारी को इतना नही तोड़ते जितना एकाकीपन और एकरसता। सारा दिन घर भर के लिए  मरने - खपने वाली नारी एकाकी हो जाती हैं उम्र के उस पड़ाव प जहाँ र बच्चो को  माँ की जरुरत परोक्ष रूप से होती हैं प्रत्यक्ष  रूप से नही  उनकी अपनी एक दुनिया बसने लगती हैं  पति अपनी दुनिया मैं बिजी हो जाते हैं  और एक गृहणी  घर के अलावा कुछ सोच नही पाती .होती होगी और महिलाये जो घर के साथ बाहर भी खुश रहती होगी पर निम्मी की दुनिया सिर्फ उसके बच्चे और सुनील के माँ- बाबा थे  सुनील का प्यार उसके लिय सब कुछ था . और ऐसे समर्पित सी लडकियां कुछ अपने लिय सोच नही पति बस 
शादी के बाद नून तेल लकड़ी (कार घर बैंक बलेंस जिम्मेदारिय बच्चो )के चक्कर में फस कर रह जाती हैं और तब  प्रेम का कोना उनका सूना सा होने लगता हैं रूटीन से पति पत्नी का मिलना एकरसता सा भर जाता हैं 
                               निमिषा बहुत ही शोख चंचलपरन्तु समझदार  लड़की थी सुनील को याद हैं कि  शादी के शुरू के दिनों में कैसे उसको रोजाना नए नए रूप में मिलती थी जब कही घूमने जाते तो अच्छे से तैयार होकर निकलती थी 
कपडे बहुत ज्यादा नही थे परन्तु उनको इस सलीके से पहनती थी तब  लगता ही नही था कि  पहले भी कितनी बार उस लिबास को पहन चुकी हैं ,रहती अभी भी साफ सुथरी हैं परन्तु अब उसको कही बाहर  जाने के लिय तैयार होना मुसीबत सा लगता हैं घर घुस्सू होकर रह गयी हैं 

सुनील परेशान हो गया .........निम्मी उसकी लाइफ़ लाइन हैं अगर वोह इस तरह उदास और निराश होने लगेगी तो कैसे चलेगी जिन्दगी 
अगर आज वोह दिन रात मेहनत करता हैं ऑफिस में तो अपने घर परिवार के लिय न . उसका भी मन करता हैं की कभी अपने लिय जिए कभी खोजाये अपने भीतर 
लोग हमेशा नारी मन की कोमल भावनाओ का बखान करते हैं एक पुरुष भी भीतर से कोमल होता हैं उसका मन भी चाहता हैंकि उसके किये का उसको क्रेडिट  मिले उसकी म्हणत को समझा जाये  होता क्या हैं पुरुष को एक बरगद का पेड़ जैसा समझ लिया जाता हैं . जो सब सुरक्षा दे आश्रय दे  सहारा दे परन्तु खुद हर मौसम में अडिग सा खड़ा रहे जबकि हर पुरुष भी कोमल भावनाए  रखता हैं .परेशानियों में उसके माथे परभी  बल पढ़ते हैं  वोह भी रोता हैं जब उसका दिल टूटता हैं परन्तु उसके आंसू कभी कोई देख नही पता दर्द अपनों का उसकी आँखे भी पढ़ लेती हैं परन्तु एक नारी जैसा बयां नही कर पाती उसकी जुबान 

मन उदास हो गया सुनील का जरा भी नही समझती निम्मी कि  काम का कितना दबाव रहता हैं ऑफिस में और ऐसे दबाव में काम करने पर अगर जरा भी त्रुटी हुयी तो नौकरी में कितनी परेशानिया खड़ी हो सकती हैं . पर क्या करे काम तो करना ही होगा न .. सोचते हुए उसने अगली फाइल को उठाया और पढने लगा
                                                   उधर  निम्मी ने भिगोने मेंचावल डालकर गैस पर चदा दिए ........ चावल के हर दाने के साथ साथ उसका कच्चा मन भी पकने लगा ...उम्र बढ़ रही हैं परन्तु जरा भी परिपक्वता नही आ रही उस में  .क्यों कई बार बच्चो सी बिफर जाती हैं निम्मी क्यों आज भी उसका मन पहले की तरह चाहता हैं कि सुनील शाम को घर आये आते ही उसे अटेंड करे उसकी दिन भर की बाते सुने /माने  और रात भर सुनील उसकी तारीफ करता रहे प्यार करता रहे मन हैं न कितना कमीना हो जाता हैं कभी कभी सिर्फ अपने लिय सोचने लगता हैं दूसरे पर क्या बीत  रही हैं जानकर भी अनजान बने रहना चाहता हैं ..... 
चलो रात  को सुनील से इस पर अच्छे से बात करूंगी सोचते सोचते निम्मी ने रसोई का सारा काम ख़तम किया और गुलाबी सूट पहन कर  सुनील के आने की बाट जोहने लगी 
ऑफिस का फ़ोन बज रहा था सुनील आँखों से फाइल पढ़ रहा था और मन उधेर बुन में व्यस्त था ...... फ़ोन कानो में लगाकर जैसे उसने हेल्लो कहा उधर  से बॉस का कॉल था .. कि  उसको उत्तराखंड के एक कसबे में एक महीने कीस्पेशल ड्यूटी पर जाना होगा ..... तनख्वाह डबल मिलेगी वह कम्पनी  को नया ऑफिस खोलना हैं तो सुनील को वहां  के कर्मचारियों कोकाम   कैसे करना हैं ट्रेनिंग  देना होगा ....सुबह १ ०  से ५ बजे तक ड्यूटी होगी ...... सुनील ने मरे हुए मन से जैसे हाँ कहा .उसे पता था निम्मी और गुस्सा हो जाएगी एक तो वोह पहले ही नाराज रहती हैं कि आप वक़्त नही देते उस पर एक महीना ............ तो क्या ? निम्मी को भी साथ ले जाए .उसके एक महीने रहने का खर्च तो कंपनी ही देगी न .....पर घर परिवार को छोड़ कर निम्मी नही जाएगी इसी उहापोह में फस सुनील घर पहुंचा 
                                         रस्ते में रेड लाइट पर एक लड़की गजरे बेच रही थी कितना पसंद था न निम्मी को मोगरे का गजरा ....... उसने २ ० का नोट देते  हुए गजरा ले लिया .....

घर में घुसते ही उसे अपने पसंदीदा मसाले वाले बैगन की खुशबू आई .ह्म्म्म तोनिम्मी को भी अफ़सोस हैं आज दिन में मुझे गुस्सा करने का .... निम्मी की आदत थी जब भी नाराज होती तो उसके बाद सॉरी कहने का उसका अलग ही अंदाज़ होता .उस दिन उसकी बिंदिया का साइज़ थोडा बड़ा होता और घर में रसोई से उसकी मनपसंद खाने की खुशबू आती ....शब्दों से नही अपनी भाव भंगिमाओ से सॉरी कहती थी उसके बाद का सारा काम  सुनील का होता था उसके प्यार का प्रतिउत्तर उसे उसी सकारात्मकता से देना होता था बस बिना सॉरी शब्द का प्रयोग किये वोह एक दुसरे के और करीब हो जाते सब गुस्सा गिले शिकवे भूल कर ...
हाथ मुह धोकर जैसे ही टेबल पर खाने के लिएबैठा तो माँ ने कहा के सुनील इस बार छुट्टियों में बच्चो को लेकर गाँव जाने की सोच रही हूँ .... बच्चो में गांव के संस्कार भी होने चाहिए न उनकी भी अपनी मिटटी से जुड़े रहना चाहिए और वहां के रिश्तेदारों से जुडाव भी ..ऐसे तो बच्चे भी पत्थर की इमारत बनकर रह जायेंगे अगर उन में  प्यार का अपनों की भावनाओ को सागर नही बहेगा तो ...... निम्मी झट से बीच में बोल उठी पर माँ मैं तो अकेली हो जाऊंगी न घर भर में अगर आप बच्चो को लेकर चली जाएगी   इनके पास तो वैसे भी वक़्त नही हैं .चहेरे पर हलकी सी नाराजगी का भाव लाते हुए निम्मी के चेहरे को देख सुनील आज परेशान नही हुआ उसका मन तो कुछ और ही सोचने लगा
                                          बच्चो का मन तो गाँव जाने के नाम से ही खुश हो गया दादी गांव में क्या क्या होगा दादू गांव में यह करेंगे वोह करेंगे ....... बस बच्चे और उनके दादी बाबा खुद में व्यस्त हो गये रविवार को जाने का कार्यक्रम बन गया .
सबको खुश देखकर निम्मी और ज्यादा कुढने लगी ...... बर्तनों को समेट  ते हुए उसे खुद पर गुस्स्सा आने लगा ............. बेकार मैंने दिन भर किचन में बिताया इनको तो मेरी परवाह ही नही ........ कैसे एक दम से बच्चो को गांव भेज रहे हैं ..यहाँ रहते तो पदाई  करते कुछ सीखते वहां  क्या करेंगे कोन  देखेगा कि  कितना होम वर्क किया .......अब अच्छी बहु हूँ न चुप ही रहना होगा पर सवाल बच्चो का हैं कैसे चुप रहू ......... पर अंदर का सच कुछ और कहता था निम्मी को बच्चो के गांव जाने से नही अपने अकेलेपन से डर लग रहा था
                                                       मन ही मन खीझती नीम कमरे में आई तो लाइट ऑफ थी .तो आज जनाब ने हमारे आने की इंतज़ार भी नही की .ठीक हैं हम ही पागल हैं न जो इनका मनपसंद खाना बनाये इनके लिय आज सज संवर कर बड़ी वाली बिंदी लगाकर रेडी हुए ......साहेब जी ने आँखे भर कर एक बार देखा भी नही .........सही कहती हैं सविता .. शादी के कुछ बरस बाद पति को पत्नी में रूचि नही रहती ..... मैं नही मानती थी यह बात पर आज सच लग रही हैं ....... गुस्से में निम्मी ने बाथरूम में घुसकर जैसे ही लाइट का बटन ओन किया सामने शीशे पर उसकी लिपस्टिक से लिखा था .... थैंक यू फॉर बैंगन और यह तेरी बड़ी सी बिंदी ...... सो जाऊ तो जगाना मत :०
                            अब तो निम्मी का गुस्सा काफूर.. और हसी आगयी उसको .यह क्या हैं मेरी नयी  लिपस्टिक ख़राब कर दी ........... और जगाना मत से क्या मतलब !!! पर बिंदी .......अरे हाँ इसका मतलब उन्होंने नोटिस किया मेरी बिंदी को .
निम्मी समझ नही पा रही थी वोह गुस्सा करे या जाकर हमेशा की तरह जगा दे सुनील को ........
                            नही!!!!! आज तो मैं नही जगा उंगी सोचकर निम्मी ने जोर से दरवाजा बंद किया और बिस्तर के दुसरे किनारे पर जाकर लेट गयी कुछ पल बाद उसको मोगरे की भीनी भीनी खुशबू महसूस हुयी ........... अरे नही यह मेरा वहम हैं सोचकर सोने की कोशिश  करने लगी ....... कभी इस करवट कभी उस करवट .पर मोगरे खु श्बू पूरे कमरे में फ़ैल रही थी ... दरवाज़े बंद होने के साथ अब वोह जैसे निम्मी को अपने आलिंगन में लेने को आतुर थी निम्मी ने झट से उठकर कमरे लाइट जल दी सामने बिस्तर पर दोनों के तकियों के बीच में गजरा था उसके साथ एक लाल गुलाब और एक ख़त
निम्मी ने पहले गजरे को उठाकर एक गहरी साँस ली मानो उसकी खुशबू से अपने तन और मन को सुवासित कर लिया मन के सारे  कडवे कलुषित भाव मानो उड़ गये हो और एक प्रेम भावना ने उसको चारो तरफ से समेट  लिया ...और ख़त यह क्या हैं ......ख़त को खोलते ही उसने देखा कि उत्तराखंड के एक पहाड़ी शहर में एक महीने रहने का मौका ..........निम्मी ख़त को पढ़ रही थी आँखों में ख़ुशी के आंसू बह रहे थे ... कितना मन था न उसका कि  शादी के बाद किसी पहाड़ी शहर में हनी मून पर जायेंगेपर तब आर्थिक हालत ऐसे न थे और अब ....... उसको लगा कि  सुनील पर बिला  वज़ह गुस्सा करती आई थी वोह
पर इतने पैसे कहा से आये ...... नही मना कर देगी वोह सिर्फ मेरी ख़ुशी के लिय इतने पैसे ख़राब करना सही नही हैं बच्चो के लिय इस वक़्त पैसे की जरुरत हैन. अचानक उसको अपने चारो तरफ मजबूत बाँहों  का घेरा कसते हुए महसूस हुआ ......... तो आप सोये नही थे जनाब .मुस्कराते हुए निम्मी ने कहा ...... जी नही जब तक मेरी निम्मी न आजाये मैं आज तलक सोया हूँ ......
अब खुश हो न ....मैंने बच्चो को गांव भेजने का कार्यक्रम इसी लिय बनाया हैं ताकि तुम मेरे साथ अच्छे और बेफिक्र मन से आ सको ....... और हाँ हमारा ज्यादा खर्च नही होगा क्युकी कंपनी भेज रही हैं मुझे वह अपने काम से .........
अब तो खश न…  निम्मी की आँखे ख़ुशी से छलछला उठी उसने झट से खुद को  छुपा लिया सुनील की बाहों में  और उसकी आँखे सपने देखने लगी पहाड़ी मॉल रोड पर हाथ मैं हाथ लिय सुनील के साथ घूमने के .......और प्रफुल्लित हो उठा उसके मन का हर कोना .

 चित्र इन्टरनेट से 

14 मई 2013

चुन्नी के किनारे

भरे पूरे परिवार में माँ आ ज भी अकेली थी  .बेटियाँ  अपने अपने घरो में
थी अब सुखी थी या दुखी थी माँ नही जानती क्युकी उन्होंने  कभी माँ से कहा
ही नहीकि हमारेससुराल में यह बात हुयी वो  बात हुयी सबने  अपना भाग्य मान
कर जो मिला स्वीकार कर लिया
 और अब तो सबने खुश भी देखाना शुरू कर दिया था   रेशमी चुन्निया  पर कब
तक आंसू सोखती हैं  और माँ की आँखे  कब तक सच से अनजान रहती हैं    माँ
की आँखे पढने लगी काले होते घेरो में छिपे राज   /  फीकी सी हंसी में
छिपे दर्द को


      अब माँ भी बहु ले आई थी   इकलोती बहु के चाव सबको थे चाहे माँ थी
या पापा  . बहने एक -दो दिन को आती   रहेगी  घर तो बहु का होता हैं
सोच माँ ने सारी ग्रहस्थी  बहु को  सौंप  दी / नए ज़माने की बहु  जिसके
लिय आटा घूधना मनिक्योरे का ख़राब होना था / सब्जी बनाने से मसाले की महक
उसके डियो   की महक को ख़तम कर देती थी /. दिन भर घूमना   और  सज संवर कर
पति को  रिझाना  बस यही उसकी जिंदगी का मकसद  हो   जैसे . पति ने अपने
ऑफिस में उसको  नौकरी दिला  दी अब वोह कम काजी महिला थी   अब  माँ  घर का
काम करती   बेटे  की माँ रानी   अब घर की नौकरानी  बनकर रह  गयी  घर में
विलासि ता का सामान बढ़ ने लगा  और इंसानों का मान घटने लगा

 गर्मिया हैं  बेटियाँ आरही हैं  छुट्टियों में ३ दिन के लिय   अपने घर
बार भी हैं उनके  .. बहु शिमला  चली गयी उस को भीड़ पसंद नही न ही दिन रात
का शोर  उसको सुकून  चाहियी  .....माँ अब  खाना बना रही हैं जल्दी जल्दी
 सब आने वाली हैं ..... उसको भी खुद को खुश देखाना हैं  आखिर माँ हैं वोह
भी  बेटियों से कम थोड़े हैं किसी भी बात में .......................
                                                      अब बेटियाँ भी पढ़
कर भी चुप हैं माँ की सूती

चुन्नी के किनारे भीगे देख कर

4 मार्च 2013

आखिरी फैसला


"दुनिया मैं अगर आये हैं तो जीना ही पड़ेगा जीवन हैं अगर जहर तो जीना ही पड़ेगा "
ऍफ़ एम् पर गाना बज रहा था अपने अँधेरे कमरे के एक कोने में बिस्तर पर ओंधी पड़ी सुमन के आंसू थमने का नाम ही नही ले रहे थे .. एक अजीब सा आक्रोश एक , अजीब सी घुटन कुछ न कर पाने की विवशता उसको अपने चारो तरफ लपेटे थी 
एक प्राथमिक विद्यालय की सहायक अध्यापिका सुमन जब स्कूल मैं बच्चो को हिम्मत और बहादुरी का पाठ पदाती थी तो एक जोश भरी आवाज़ निकलती थी अन्याय का सामना करने की सीख देती सुमन अपने ही घर मैं किसी अन्याय के विरोध नही कर पाती थी 
कितनी चाह थी उसको कि पढ़ - लिख कर डॉ बने परन्तु घर के सीमित साधनों ने उसके सपनो की उड़ान को सिर्फ कल्पनाओ में ही खुश होने दिया और न चाह कर भी पिता ने उसको बी। टी। सी। करायी के सरकारी नौकरी मिलेगी भविष्य सुरक्षित रहेगा .
देहरादून शहर से बहुत दूर सहिया के पास बहुत ऊंचाई पर अलसी ग्राम में उसको पहली पोस्टिंग मिली ।मैदानी इलाके की सुमन को इतने ऊँचे पहाड़ पर जाना ही बहुत मुश्किल लगा ,परन्तु पिता के दबाव और सरकारी नौकरी की सामाजिक इज्जत की वजह से उसको जाना पढ़ा \ कितना अकेलापन सा लगता था उसको वहाँ । सुमन माह में एक बार देहरादून आती थी। धीरे धीरे उसने अलसी में  मन लगा लिया ।विद्ध्यालय परिसर में ही एक कमरे में रहकर उसने ग्राम की सब बड़ी और समवयस्क महिलाओ से मित्रता कर ली \समय पंख लगा कर उड़ने लगा \ पहाड़ जितने ऊँचे होते हैं वहाँ रहने वालो की उम्मीदे उतनी ही न्यून . कम में ही खुश रह जाने वाले भोले से लोग कितनी जल्दी अपना बना लेते हैं यह वहाँ  रहने वाले ही जान सकते हैं ।समय बीत रहा था साथ ही उम्र भी हर बरस नए पायदान पर पांव रख देती थी . छुट्टियों में देहरादून जाकर लम्बे समय तक रहना और 4 छोटी बहनों के साथ उनकी छोटी छोटी इच्छाए पूरी करना उसके अतृप्त मन को संतुस्ष्ट करता था ।
                                                                             माँ- बाबा को उसके विवाह के लिय उचित वर की तलाश थी राजीव अपने परिवार के साथ उसको देखने आये . सांवला सा लम्बा कद- काठी वाला राजीव उसको एक नजर में ही अपना सा लगा था उस पर उसकी केन्द्रीय सरकार के आधीन नौकरी घर भर के लिय सबसे बड़ा आकर्षण थी ।घर /परिवार के साथ सब आस- पास के लोग उसके भाग्य को सरहाने लगे ।
                                       सास बलाए लेते नही थक रही थी अपनी गोरी चिट्टी चाँद सी बहु की . अब तो सुमन को भी रश्क होने लगा अपनी ही किस्मत से जैसे जिन्दगी का सब अधूरापन ख़तम होने को हैं . कांवली रोड के नाथ पैलेस में धूम धाम से विवाह हुआ . पति ने कुछ पैसे देकर कुछ सिफारिश लागाकर उसका ट्रांसफर सहसपुर करा लिया . रोजाना बस से जाना स्कूल ख़तम होते ही लौट आना 
                                              जिन्दगी अपने आप चलने लगी थी । बहुत खुश थी सुमन राजीव को पाकर ,परन्तु समय के साथ साथ सास मांजी का लहजा बदलने लगा के विवाह को आठ माह होगये अभी तक कोई खुश खबरी ही नही < माँ बन ना हर नारी का सपना होता हैं सुमन भी माँ बन न चाहती थी उसका भी मन करता था के उसकी गोद में भी एक प्यारा सा बच्चा हो जब भी वोह इन ख्यालो में खो जाती तो उसको अपनी बाहों में एक प्यारी सी बिटिया ही दिखती थी 
                                               इश्वेर ने एक दिन उसकी पुकार सुनी और फिर से सुमन घर भर की रानी बन गयी। उसके खाने पीने से लेकर स्कूल आने जाने तक का इंतजाम नए तरीके से किया गया अब घर के बाहर से " सूमो ' उसको लेकर जाती और घर के बाहर ही छोडती थी । बसंत- विहार की सड़को पर सैर करती सुमन को अपना जीवन स्वर्ग सा लगता सास मांजी अपने आने वाले पोते के लिए ऊन लाकर मोज़े बुन रही थी सब उत्साहित थे समय आने पर  उसको आस्था नर्सिंग होम लेजाया गया लम्बी प्रसव पीड़ा के बाद उसने एक कन्या को जन्म दिया और मानो गुनाह कर दिया सबके चेहरे मुरझा गये , राजीव भी थोडा चुप हो गये यंत्रवत अपने काम में लगे रहते , बिटिया रूचि अगर र्र्र्रोती भी तो कोई जल्दी से उसको उठाने वाला भी नही था 
समय बीत रहा था . मैटरनिटी लीव ख़तम होने वाली थी अब बिटिया को कौन देखेगा यह सोच कर सुमन ने 2000 में एक महिला को रूचि को सम्हालने का काम दिया सरल स्वाभाव की ममतामयी मोनिका सुमन की सम्व्यसका थी ।उसकी अपनी भी एक बेटी थी जो 5 बरस थी और स्कूल जाती थी मोनिका के सहारे बेटी को छोड़ कर स्कूल जाती सुमन अब निश्चिन्त थी  देखते ही देखते रूचि 9 माह की हो गयी थी उसकी आँखों में माँ को देखते ही चमक आ जाती थी . परन्तु सुमन की तबियत कुछ ठीक सी नही थी हर वक़्त थकान भूख न लगना जी मिचलाना . सुमन को घबराहट होने लगी . अभी तो रूचि बहुत छोटी हैं क्या एक बार फिर से वोह ......... ओह!!!! अब क्या करे ।आजकल इस बात का पता करने के लिय हॉस्पिटल जाना जरुरी नही टी . वी ने इतना जागरूक बना दिया की एक स्ट्रिप लाओ और घर में ही पता लगा लो कि गर्भ हैं या नही . सुमन को वोह 2 पल जिन्दगी के सबसे भारी पल लग रहे थे ख़ुशी भी भीतर से तो एक अनजाना डर भी । रिजल्ट सकारात्मक देख कर उसको घबराहट होने लगी की  राजीव का न जाने क्या रिएक्शन होगा और मांजी ...उनकी सूरत यद् करके सुमन  के हाथ -पैर ही कंप कापने लगे 
                                                                     राजीव ने जैसे उसके फिर से गर्भ धारण की खबर सुनी तो ख़ुशी से फुले न समाये . जैसे उन्होंने कोई किला जीता हो एक पुरुष की जिन्दी का सबसे बड़ा क्षण  होता होगा जब उसको पपात चलता होगा कि  वोह पिता बन ने वाला हैं  एक नए जीव का आना सुखद ही लगता हैं  मांजी ने भी ख़ुशी भी जाहिर की परन्तु  उनके तीखे शब्दों ने राजीव के मन में एक संशय भर दिया कि  "इस बारी चेक करा लेना ,कही इस बार भी लड़की ही न जन दे तुम्हारी लाडली बीबी । बिना बेटे के तो स्वर्ग भी नही मिलता । आजकल वोह जमाना तो हैं नही के बेटे के इंतज़ार में 5-5 लडकिया जन दो . अब ख्याल  रखना कही अपना माँ का इतिहास न दोहरा दे यह लड़की हमारे घर में भी और तू तमाम उम्र बेटियों के ब्याह के लिए पैसा पैसा जोड़ता रहे ""


राजीव की अल्प बुद्धि लड़के लड़की का फर्क तो समझ गयी परन्तु यह नही जानपाई कि  लडकिया भी जिन्दगी में उतना ही महत्त्व रखती हैं जितना की एक लड़का . अब राजीव सुमन पर दबाव बनाने लगा की हमें पहले टेस्ट करना होगा कहा से आएगा दो दो बेटियों की पढाई से लेकर विवाह तक का खर्चा , सुमन ने बहुत कोशिश की परतु उसकी आवाज़ नक्कारखाने में तूती सी रह गयी आखिर टेस्ट कराना  ही पढ़ा और उसकी डॉ ने " जय माता की " कहकर जैसे वज्रपात कर दिया राजीव और मांजी पर .... अब सबके सुर बदल गये।।समाज की , पैसे की , अगले लोक-परलोक की दुहाई देकर उसे इस गर्भ से छुटकारा पाने के लिय मजबूर किया जा रहा था। अपनी माँ के पास जाकर उसने उनका संबल और सहारा चाहा तो माँ के आंसू उसकी मज़बूरी बयां कर गये ,5 बेटियों की माँ कैसे उसका सहारा बनती जो खुद पति के सामने एक शब्द नही बोल पाती थी 
                                                                कितनी मजबूर हो जाती हैं ना नारिया!!! कहने को कहा जा सकता हैं कि लड़ जाती अपनी अजन्मी संतान के लिय , एक माँ अपने बच्चे के लिए कुछ भी कर सकती हैं परन्तु सच एक दम अलग होता हैं यह समाज पितृ प्रधान हैं मायके का संबल न होतो स्त्री कुछ नही कर पाती बचपन से पिता और भाई के आधीन रहने वाली सहमी सी लड़की सब विवाह के बाद पति के घर जाती हैं तो जाने - अनजाने वोह उसकी जिन्दगी पर हावी हो जाते है और स्त्री उसे प्यार समझ बैठती हैं और वही प्यार जब उसकी जिन्द्दगी के हर फैसले करते हैं तो उसे घुटन होने लगती हैं परन्तु उस घुटन से निजात पाने के लिय विद्रोह करना सारे समाज से खुद को अलग करना होता हैं । किताबो में नारी स्वतंत्रता की बाते लिखना और अपनी जिन्दगी में उनको ढालना अलग अलग बाते है जो ऐसा कर पाती हैं उनका बचपन या तो बहुत सुखद होता हैं या वोह जिनके लिय यह सब बाते करना फैशन होता हैं या फिर वोह महिलाये जिनमे आग होती होती है समाज में लड़ मरने की ,लोहा बना लेती हैं खुद को .. बचपन से पिता की एक ऊँची आवाज़ पर डरने - सहमने वाली लड़की ससुराल में भी मान्यताओ रिवाजो और परम्परा के नाम पर चुप रह जाती हैं या दबे स्वर में किया गया उसका विरोध कोई माने नही रखता हैं
                                                    आज आखिर टूट गयी सुमन . हार गयी उसकी ममता इस समाज के सामने . एक नारी ने ही उसके नारीत्व का अपमान कर आने वाली नारी का कतल करा दिया वोह भी एक नारी के ही हाथो से .किसी को भी जरा भी अपराध बोध नही सिवाय सुमन के ।
उसकी जार जार बहते आंसुओ का किसी की आत्मा पर कोई फर्क नही पढ़ रहा था ।कौन कहता हैं कि  कतल सिर्फ गरीबी की वजह से होते हैं कुछ क़त्ल ऐसे होते हैं जो किसी को अपने होने की खबर भी नही होने देते अम्मा जी गुड का हलवा बनाकर रख गयी थी सिरहाने . जिसे खाने का भी मन नही किया सुमन का ।
                                                                                    अचानक तेज आवाज़ ने सुमन का ध्यान भंग किया और रूचि घुटनों चलती हुए उसके पलंग के पास खड़ी थी रूचि का मन भीग गया .. कम से कम जो आज मेरी झोली में हैं उसको तो सम्हाल लूँ . उसने मोनिका को आवाज़ लगायी कि  रूचि के लिय कुछ खाने के लिय ले आओ ।अब सुमन ने भी मूक प्रतिशोध लेने की ठान ली . उसे याद आया कि  अलसी में एक बूढ़ी मांजी ने कभी बताया था कि फलां जड़ी- बूटी खाने से नारी बंजर हो जाती हैं तो बस अब वोह और संतान ही नही जन्मेगी , कर ले कोई कोशिश जितनी चाहे ...कम से कम अपनी उस अजन्मी बेटी की आत्मा को तो न्याय दे पायेगी  ............मन ही मन सोचती सुमन के मन बंधन ढीले पढने लगे
                                       मोनिका ने केले काटकर उनके सामने रख दिए और बोली दीदी अब मैं नही आ पाऊंगी क्युकी मैं पेट से हूँ मेरे पति ने कहा हैं कि अपना ख्याल रखना ज्यादा जरुरी हैं उसने शाम को ओवर टाइम काम ले लिया हैं अब आप रूचि के लिय कोई और आया ढूढ़ ले ! 
" तुमने टेस्ट नही कराया , अगर इस बार भी लड़की हुए तो ?"
"नही दीदी अब चाहे लड़का हो या लड़की सब अपनी अपनी किस्मत लेकर आयेंगे . लड़के कौन सा आज चवर ढुलाते हैं दिल्ली वाले बस कांड को ले लो आज उन लडको की माँ उनको पैदा करने का अफ़सोस करती होगी , मुझे दूसरा बच्चा चाहिए अब चाहे बेटा  हो या बेटी कम से कम आगे जिन्दगी में  एक दुसरे का साथ तो बना रहेगा उनका , यह टेस्ट - वेस्ट तो आप जैसे पढ़े  लिखे लोगो का ही काम होता हैं "
                                                    मूक अवाक् सी सुमन उसका मुँह  देखती रह गयी . कितनी सच्ची बात कह गयी न मोनिका .कल 8 मार्च हैं और  सुमन का जन्म दिन और महिला दिवस  भी और उसने सोच लिया कि अबकी बार जरुर गर्भ धारण करेगी परन्तु अबकी बार किसी के दबाव में नही आएगी और अपने बेटी के लिय उसका सगा भाई या बहन जो भी होगा ले कर आएगी . समाज में एक छोटा सा उसका कदम ही उसकी बेटी को उसकी जिन्दगी में सफल बनाएगा वरना कल उसकी बेटी भी इसी तरह बिस्तर पर अपनी अजन्मी बेटी का अफ़सोस  मानती रहेगी ......................और खुद को कोसता रहेगा उसके मन का भीगा कोना ........ 

14 जनवरी 2013

Sanskaar

आज फिर माँ ने फ़ोन छीन लिया . जीनत का सन्देश आया होगा , पता नही माँ को क्या हो जाता हैं जब भी सेल फ़ोन में सन्देश को पढने लगता हूँ माँ अचानक कमरे में आ जाती हैं । उम्र हो गयी माँ की जितना भी खुद को प्रगतिशील कहती रहे अंदर से दकियानूसी विचार ही होंगे न । मेरे सब दोस्तों को देखो सबकी कोई न कोई लड़की दोस्त है मुझे तो माँ किसी लड़की से बात करते भी देख लेगी तो बेहोश हो जाएगी कि 
"क्या यह संस्कार दिए हैं मैंने "। 
"पढ़ा मत कर बस जब देखो लडकियां ।" 
अब आजकल माँ को पता नही क्या हो गया हैं जब देखो मुझे भाषण देती रहती है कि  लडकियों से लड़ा मत कर, ज्यादा बात न किया कर ,बस पढाई में ध्यान लगाया कर ,अच्छा बच्चा बन
कितना अच्चा बच्चा बनू /
 जब से यह दिल्ली में   वोह  दामिनी वाला कांड हुआ हैं सबकी मम्मियां बदल गयी हैं  उस पर से यह मीडिया वाले !!
अखबार में शोर मचा  हैं कि  माए अपने लडको मैं संस्कार नही भरती  ! अब संस्कार भी क्या कोई  दवाई हैं जो माँ  हमें खिल देगी ।हम ऐसे काम नही करेंगे  ।अब हम थोरे ही गलत हैं।  अब उन 6 लडको ने जो किया उसका खामियाजा हम क्यों भुगते ?हां अब दोस्तों मैं लडकियों को लेकर हसी -मजाक तो चलता ही हैं पर इन मम्मा लोग को कौन समझाए ?
                                                                 अब कल परवीन की माँ ने उसको ऋचा का मजाक उड़ाते सुन लिया तो बरस पढ़ी ।अब उन्होंने सिर्फ उसको सुना ,उधर से ऋचा क्या क्या बोल रही थी, आंटी को नही पता चला था ।अकेले परवीन ही परेशान नही था क्लास के सारे लड़के लडकिया परेशान थे। परसों अभी की जन्मदिन पार्टी सिर्फ इसी वज़ह से दिन में रखी  गयी क्युकी किसी भी लड़की की माँ उनको शाम 8 बजे तक बाहर रहने की अनुमति नही दे रही थी और किसी भी लड़के की माँ शाम की पार्टी में लडकियों को बुलाने के पक्ष में नही थी  ! अब यह क्या बात हुए ?जब हम क्लास मैं पड़ते हैं तो क्या हम यह सोच कर पढ़ते है के मैं लड़का हूँ यह पाठ पढू और यह लड़की . कितनी गलत बात हैं न !!!!?
:"सोनूऊऊऊउ "
लो हो गयी शुरू मेरी मदर इंडिया अब होगा इनका प्रवचन शुरू "
झुन्झुलाते हुए सुनील ने सामने पढ़ी किताब को खोल लिया और पढने का बहाना बनाने लगा
माँ आई और ढूध  का गिलास रखकर प्यार से सर पर हाथ फेर कर चली गयी
"दूध का गिलास हुह जब देखो यह खा ले वोह खा ले "
. " कभी मुझे अपनी जिन्दगी तो जीने नही देती .
यह फेसबुक ने भी माँ लोगो को बिगाड़ दिया है पता नही कैसे कैसे सहेलियां  बना लेती हैं खुद तो अनजान दोस्त बना लेगी और हम हैं कि  जान पहचान वाली लड़की के साथ स्कूटर पर भी कही नही जा सकते . जब मैं बड़ा हो जाऊँगा न अपने बच्चो को जो चाहे करे करने दूंगा . 
नही पीना मुझे ढूध्ह ."
सोचते सोचते सोनूका दिमाग कहा से कहा पहुच गया  यह उम्र ही ऐसे होती हैं कब कोन  सी बात पर चीड़  जाये कहा नही जा सकता । किसी भी बात पर उनको अपना स्टैंड सही लगता हैं  किसी भी बात को गलत कहा जाए तो  बहस करने को तैयार । उल्टा जवाब देने से मना  करो तो बोलेंगे  माँ हम क्या हम अपनी बात भी नही कह सकते , आप तो बस हमें डांट कर चुप करा देती हो ।अब बच्चे  हैं न सोचो में कहा से कहा तक पहुँच जाते हैं और वक़्त बेकार हो रहा हैं इसका उनको भान ही नही होता
"पापा आ गये पा आ गये "
लवलीन की आवाज़ सुनकर सुनील भी अपने से बाहर की तरफ आया
" अरे वाह ! पापा यह क्या गिफ्ट लाये हो आप !"
"बच्चे मेरा प्रमोशन हो गया हैं "
"आज दफ्तर में  समारोह था उसमे मुझे यह उपहार मिला हैं "
"पापा मैं इसको खोलू?"
"हाँ बच्चे आप इसको खोल कर देखो और अपनी माँ को दिखाओ "
अर्राए !! यह सब क्या हैं
"पापा आये नही के तुमने उनकी तलाशी लेनी शुरू कर दी चलो जाओ यहाँ से , पापा को आराम करने दो "
 उफ़ यह मम्मी भी न !!!!
मन में गुस्सा लिए सुनील अपने कमरे की तरफ  बढ गया
यह मम्मी भी न जब देखो पापा पर अपना एकाधिकार जमा लेती हैं
"दिन भर इनकी किट्टी पार्टी वाली सहेलियों के फ़ोन आते हैं फेस बुक तो खुला ही रहता है आते - जाते झांक लेती हैं किसने क्या लिखा और शाम होते ही पापा पर इनका एकाधिकार यह तो अच्छी बात हैं लवलीन हैं जो उसके साथ खेल लेता हूँ थोड़ी देर
टी।व् भी कुछ देर ही देख पता हूँ  उसकी मेहरबानी से  वरना माँ को तो मुझे दुनिया का सबसे अच्छा  बच्चा बनाने का मैडल लेना हैं "
अब  होम वर्क कर न होगा  कल सुलेकना का जन्म दिन हैं स्कूल मैं ही सबके लिय बर्गर और केक लेकर आएगी अगर माँ को बताया तो कहेगी की 
"क्यों? अपने घर का खाना कहो "
ब्लाह्ह ब्लाह्ह ब्लाह्ह 
कितना बोलती हैं यह माँ लोग "






पापा!!!
सर पर प्यार भरा स्पर्श पाकरहोमवर्क में  मग्न  सुनील का चेहरा खिल गया । पापा के हाथ में खाने की थाली थी . हाथ से एक एक कौर तोड़ कर खिलाते हुए पापा ने ढेरो बाते की
"पापा ! एक बात बताओ क्या लडकियों से लड़ना गलत बात हैं "

"नही बेटा !!!क्यों गलत ! जैसे तुम अपने लड़के दोस्तों  से लड़ते हो वैसे ही उनसे भी लड़ो न वोह तुमसे कमथोडे  ही हैं न "
पापा हस पढ़े
उनको माँ याद आगयी होगी न
"पापा फिर माँ क्यों कहती हैं अब लडकियों से ज्यादा बात मत करो उनको दोस्त नही बनाओ"
 कल सिम्मी आंटी भी कह रही थी के जिस लड़की के लिय दिल्ली में धरना प्रदर्शन हो रहा हैं वोह एक दोस्त के साथ घूमने गयी थी अब  तो बाबा अपने लडको को ही लडकियों से दूर रखो" ऐसा क्यों पापा
क्या अब जीनत का दोस्त नही रहा मैं ? वोह मेरी गर्ल फ्रेंड थोड़े ही है

बच्चे की आँखों में जब सवालो का तूफ़ान उठ'ता हैं तो उसको शांत करना कितना मुश्किल होता हैं ..... आजकल के बच्चे कितने मोर्चो पर लड़ रहे हैं पढाई का बोझ , अच्छे नंबर लाने की होड़ , घर में तनाव की हट आहात उनको परेशान  और   उनको कमजोर बना देती हैं उस पर यह टी।वी और यहमाता -पिता  का फेस बुक प्रेम बच्चो का  रहा सहा टाइम भी उन्होंने ले लिया
सर पर हाथ फेरते हुए सुनील की आँखों में झांकते हुए पापा बोले
"बेटा  दुनिया में जितने भी साधन बने हैं सब मनुष्य की सहूलियत के लिए बने है परन्तु हमने ही  उनको विलासिता बना लिया हैं सबका अब दुपयोग हो रहा हैं आपको सेल फ़ोन दिया गया था की आप जहाभी जाओ हमारी पहुच में रहो आपको कोई भी जरुरत हो आप हमें बुला सको क्युकी अब वो जमाना नही रहा के कोई अजनबी से सहायता ली जाए या वोह सहायता कर भी देगा उसकी गारंटी नही । लेकिन आप सारा  समय व्हाट'स उप पर लगे रहते हो या दोस्तों के साथ संदेशो  का आदान-प्रदान में !इसी तरह जिस तरह का व्यवहार आप अपने लड़के दोस्तों से करते हैं उसी तरह का व्यवहार अपनी लड़की मित्रो से रखो इस उम्र में बहुत आच्छा  लगता हैं विपरीत लिंगी का अपने पास होना , तुम लड़कियों  से दोस्ती रखो परन्तु याद रहे की  हर रिश्ते की एक मर्यादा होती हैं हमें हमेशा अपनी सोचो में भी याद रखना चाहिए की  जैसा हम सोचते है जरुरी नही दूसरा भी ठीक वैसा ही हमारे लिय सोचता होगा इस लिय सबकी सोच की इज्ज़त करनी चाहिए  और किसी के भी स्पर्श को पहचान न चाहिए  न तो किसी को खुद को स्पर्श करने दो न ही किसी को भी स्पर्श करो . भगवन ने हमें लड़का या लड़की बनाया तो हमें दुसरे लिंग की भावनाओ का सम्मान करना चाहिए ।"
                                                          " माना आज तुम्हे एक लड़की बहुत ही प्यारी से लगने लगी हैं तुमको उसका साथ हर वक़्त पसंद हैं तुम दिन में 10 सन्देश उसके सेल पर भेजते हो तो क्या होगा !! तुमको तो वोह पसंद हैं परन्तु उसको तुम न पसंद हो तो या उसको तुम्हारे संदेशो से कुछ फर्क नही पड़ता या उसकी परिवार को नही पसंद होगा यह सब आब उस लड़की को आपकी वज़ह से कितनी परेशानिया होंगी न ..क्या आप चाहोगे के जिसे आप पसंद करते हैं के वोह परेशान हो तो उसकी ख़ुशी के लिय अपने चारो तरफ एक सीमा बनाओ के कोई भी मित्र को चाहे लड़की हो या लड़का न तो हद्द से ज्यादा उसके पीछे पढो न उसको नेगलेक्ट करो बस उसकी शक्सियत को इज्ज़त दो आगे जाकर देखना जब तुम जिन्द्दगी में कुछ बन जाओगे तुम्हारे अच्छे नो आयेंगे तुम कक्षा में आल राउंडर बनकर आसेम्बली मैं खड़े होगे तो सब चाहेंगे के तुमसे दोस्ती करे "
पापा पर वोह जो दिल्ली वाली लड़की थी उसके साथ जो लड़का  दोस्त था उसने गलत किया था  उसके साथ रहकर /जाकर "....... सोनू ने झिझकते हुए पुछा
"नही बेटा  !!!वोह बहुत बहादुर था उसने कुछ गलत नही किया था द्द्दो दोस्त है एक साथ कही जाकर वापिस आ रहे थे बस कुछ राक्षस जैसे लडको ने उनके साथ गलत किया था इसका यह मतलब नही है कि  सब लड़के गलत हैं  न ही  आप गलत हो कि आपको अब लड़की से बात नही करनी ."पापा ने प्यार से सर पर हाथ लगते हुए कहा
"फिर मम्मा क्यों कहती हैं के अब लडकियों में ध्यान न दिया करो "
 "सही तो कहती हैं  आपकी पढाई की उम्र हैं लड़की को दोस्त मानो मनोरंजन का एक साधन नही
और बच्चे !  मम्मी भी एक लड़की है न
अब जब उस लड़की के साथ इतना सब कुछ बुरा हुआ तो अंदर तक उद्वेलित है
उनको बहुत गुस्सा हैं सब पर, पर हम पर नही तुम पर नही वोह हमारी हैं न"  आँखों में आँखे डाल कर पापा ने समझाया
उनको लगता हैं के समाज में बदलाव हो परन्तु कैसे नही जानती . हम दोनों है न हम आपकी मम्मी को कभी ऐसा मौका ही नही देंगे कि  उनको लगे कि  लड़के लडकियों से गलत व्यवहार करते हैं आपका फ़ोन भी उन्होंने जीनत के सन्देश के लिय नही छिना था उन्होंने आपका फ़ोन इस लिय लिया था क्युकी आपके फाइनल परीक्षा पास आरहे है बस इसी लिय 
                         बस उनका तरीका गलत था सारा दिन अखबार , नेट टी।वी पर देख देख कर उनका मन आक्रोशित हो गया हैं अब हमको ही उनको समझना है न "
सुनील का बल मन सोच में पढ़ गया हाँ पापा सही तो कह रहे है मम्मा के मन में परेशानी होगी तभी गुस्से में बोल गयी मुझे वैसे तो है न मेरी प्यारी मम्मा 
 ओके अब मैं मम्मी  को कभी यह महसूस नही होने दूंगा कि
 हर लड़का गलत होता हैं और उनका प्यारा बेटा बनूगा  कमरे सेबाहर दौड़ लगते हुए सुनील जोर से चिल्लाया
"ंंमाँ आआंंआआआआआआआआ
सुनो कल मेरी एक दोस्त का जन्म दिन हैं कोई गिफ्ट दो न उसके लिय .. 
 सब स्कूल मैं ही जन्मदिन मनाएंगे  क्युकी सबको पढना भी है न और हाँ आप मेरा सेल फ़ोन भी अपने पास रख लो जब कही जाऊँगा आप से ले लूँगा "
 पापा परदे के पीछे से देख रहे थे  की बच्चे कितने कोमल होते हैं माँ समझाए या पिता . संस्कार देने से आते हैं समझाने से नही अनदेखी करने से नही 
 आँखों में आंसू लिय पत्नी को देखकर भीग गया उनके मन का भी एक कोना ........................................

18 दिसंबर 2012

Maa ki Najar se

अम्मा!!!!! अम्मा!!!!!! 
फ़ोन पर किसी की बात सुनकर रमेश  जोर से चिल्लाया ......आधी रात को कोई बुरा सपना देख लियो का ? यह लड़का भी ना , रात  भर देर तलक पढता हैं  फिर सुबह मुंह ढापे पढ़ा  रहता हैं .मीना की माँ ने रजाई एक तरफ सरकाई  और  पलंग   के पास चप्पल खोजने लगी .तब तक रमेश अम्मा के पास आ पहुंचा .उसकी बदहवासहालत देख कर अम्मा का दिल जोर से धड़क   उठा   "क्या हुआ?"
"अम्मा ! वोह  .वॊऒऒऒऒऒऒऒ "
 "क्या वॊओ वॊऒओ किये जा रहे हो क्या हुआ "
 "अम्मा! वो जीजी जी ....जी इ इ इ इ इ "
 "हाय रे! मेरी फूल सी लाडो  को क्या हुआ/" 
 "अम्मा वो हस्पताल में हैं "
 "हाय रे   !!!"
 "लग गयी होगी ठण्ड  मरजानी दिल्ली की ठण्ड भी तो।। "
" कित्ती बार कहा इस लड़की को  गरम कपड़े पहना कर पर  यह आजकल की लडकियाँ " ! 
"इस बार तो लड्डू भी न भेजे मैंने बनाकर "
 "पिछली बार भी कित्ती खांसी हुई थी ओर  बुखार भी .. "
 अम्मा थी कि बुदबुदाये    जा रही थी  खुद ही खुद पर  कभी खुद को कोस रही  थी  कि  इस बार लड्डू क्यों नही बना कर भेजे 
 खुद डाक्टर बन रही हैं पर इलाज तो माँ के ही काम  आते हैं ना . चार किताबे पढ़ लेने से  जिन्दगी पढनी नही आ जाती इन बच्चो को 
 अलमारी से अपने गरम कपडे निकल कर बैग में ठूंसती  अम्मा अनजान थी कि रमेश अपने बाबूजी के कान में क्या कह रहा हैं उन्हें तो अपनी फूल सी मीना याद आ रही थी  कितनी मेधावी थी उनकी मीना . उनकी बिरादरी वालो ने बहुत चाहा  की कि अम्मा अपनी मीना का ब्याह कर दे अच्छा  घर बाहर देखकर , पर अम्मा को मीना का सपना पूरा करना था उसको डाक्टर बन ना था 
 4 साल देहरादून के एक पैरामेडिकल  से उसने पढाई की  अब उसको इंटर्न शिप करनी थी 
 "देहरादून में भी बहुत स्कोप हैं  परन्तु दिल्ली में इंटर्नशिप करने से अच्छी नौकरी मिलेगी  '...मीना की बात से अम्मा ने उसको दिल्ली भेज दिया 
 कितनी खुश थी लाडो .परसों ही तो फ़ोन पर बात की उसने के अम्मा आप परेशान मत होना मैं  यहाँ ठीक हूँ 
 जानती थी अपनी बेटी को  बहुत ही संस्कारी लड़की हैं  ऐसा नही कि उसने अपनी बेटी को नए ज़माने के साथ चलना नही सीखाया था  परन्तु उसकी बेटी ही इतनी गुणवान ओर संस्कारी थी कि कुछ भी करती थी तो माँ के संज्ञान में ...
 ना जाने कैसे होगी ?
  नहा कर जब बाहर आई तो देखा कि  रमेश के बापू भी तैयार होकर खड़े थे  कितने खिलाफ थे यह मीना के डाक्टर बन जाने के ...कि  जमाना बहुत ख़राब हैं  लड़की जात हैं ब्याह के अपने घर जाए वह जाकर जो मर्जी करे जितना मर्जी पढ़े ...आज बिटिया  की तबियत जरा सी नासाज हुई  नही कि  साथ चलने को तैयार हो गये . मीना की अम्मा मन ही मन मुस्कराने लगी ...... कार में बैठ  कर भगवन को  मन ही मन नमस्कार करके यात्रा शुभ हो की कामना करने लगी 


 सुबह के चार बजने को हैं सुबह  ट्रैफिक कम होता हैं फिर भी रमेश  ने कार तेज स्पीड से चलानी शुरू कर दी 
 शायद बहन की फ़िक्र हैं इसको भी  भगवन इन भाई बहन का प्यार हमेशा बनाये रखे  . उसने नजर भर कर रमेश के बाबूजी को देखा ... कैसा पीला लग रहा हैं चेहरा .... बेटी की फ़िक्र या इतनी जल्दी सुबह उठने की  वजह से ... जो भी हो जब बेटी का हाथ हाथो में लेंगे और वोह कहेगी कि   बाबूजी  ताश खेले  भाभो में हर बार की तरह इस बार भी मैं  ही जीतूंगी  तब देखना कैसे ंमंद मंद ं मुस्करायेंगे 
 कार तेजी से दौड़ रही थी साथ ही मन भी .... बस मीना की डाक्टरी  पूरी हो जाए  तो इसका ब्याह कर दूँगी  अगले साल ... छोटे छोटे नाती नातिनो के साथ खेलने का बड़ा  मन करता हैं .साथ वाली रामो जब अपने बच्चो संग मायके आती हैं और उसके बच्चे जब उसको भी गोरी  नानी  कहते हैं तो मन कही सुकून सा पाता  हैं कि  उसके नाती भी उसको गोरी नानी कहेंगे या आजकल के  माँ - बाप की तरह मीना भी उनको बड़ी मम्मा कहना सिखाएगी 
 सोचो के सागर में गोते खाती  मीना कब दिल्ली पहुँच गयी पता भी नहीं चला . कार सफदरगंज अस्पताल के सामने रूक गयी रमेश तेजी  से  रिसेप्शन पर पंहुचा  अम्मा सामने रखी कुर्सी पर  बैठ गयी 
 सुबह सुबह अखबार पढने ंका आनद ही कुछ और होता हैं . पहले पेज के तीसरे कलम में एक खबर पर नजर एक पल को रुकी " दिल्ली ंमें चलती बस में एक छात्रा से गैंग  रेप " 
"निगोड़े ,"क्या हो गया यह आजकल के बच्चो को ! लडकिया दिल्ली जैसे राजधानी में ही जब स्सुरक्षित नही तो गाँव  के दबंगों के सामने उनकी क्या हिम्मत !  मन ख़राब सा हुआ पढ़ कर ओर अखबार सामने रख कर  देखने लगी कि  रमेश  किदर गया ? 
 सामने से दो पुलिस वालियों के संग  रमेश आ रहा था "इसकी आँखे रोई सी क्यों हैं ?  माँ का मन आशंकित हुआ 
" अम्मा जी ःहिम्मत रखो  हम आरोपी को छोड़ेगे नही . "
"अरे हुआ क्या?????????????????"
" मेरी बच्ची को क्या हुआ ?"
"अरे रमेश!!!!"
" हाय मेरी बच्ची !"
 तेजी से कदम रखती वोह आई सी यू  की तरफ भागी जिधर  से रमेश आ या  था 
"हाय मेरी बच्ची  !!!तुझे भगवान् मेरी भी उम्र दे "
मन ही मन बलाए उतरती एक माँ की आँखों से आंसू बहने लगे 
रमेश के बाबु जी माथा पीट रहे थे 
 रमेश की आँखे खून के आंसू रो रही थी 
 पुलिस वाली ने हाथ थामकर उनको सब बताया 
( नही सीसा उड़ेल दिया उसके कानो में )
 वोह सब !!
 जिसको कभी कोई माँ- बाप नही सुन ना  चाहेगा 
 कोई भाई  इस दिन को देखने से पहले मर  जाना चाहेगा 
 अपनी हाथ की राखी उसको जहर लगने लगेगी 
 उसके सामने अखबार की वोह खबर घूम गयी 
 धच्च! से वोह जमीन पर गिर गयी 
 पूरी दिल्ली में सिर्फ मेरी बेटी !!!
.....
.
.
 अब माँ के हाथ जो उसकी सलामती की दुआ कर रहे थे 
  सोचने लगे कि  वो दुआ करे तो क्या? 
 सुन्न था  उसके लहुलुहान  मन का कोना 
 नीलिमा शर्मा 

10 दिसंबर 2012

Mayka ( मायका )

सोफे पर पीठ टिकाये  निशा ने आँखे मूँद ली . पर आँखे मूँद लेने से  मन सोचना तो बंद नही करता न .  मन की गति पवन की गति से भी तेज होती हैं . एक पल मैं यहाँ तो दुसरे ही पल सात समंदर पार .,
एक पल मैं अतीत के गहरे पन्नो की परते उधेड़ कर रख देती हैं तो दुसरे ही पल मैं भविष्य  के नए सपने भी  देखना शुरू कर देती हैं .  निशा का मन भी  उलझा हुआ था अतीत के जाल में .  तभी फ़ोन की घंटी बजी 
" हेल्लो "
"हाँ जी बोल रही हूँ "
"जी"
 "जी "
" जी अच्छा"
" में उनको कह दूँगी "
 "आपने मुझसे कह दिया तो मैं  सब इंतजाम कर दूँगी ""
 "विश्वास कीजिये मैं  आप को  अच्छे से अटेंड करुँगी आप आये तो घर "
" यह तो शाम को ही घर आएंगे इनका सेल  फ़ोन भी  घर पर रह गया हैं "
"आप शाम को 7 बजे के बाद दुबारा फ़ोन कर लीजियेगा "
 "जी नमस्ते "

                                                                                           फ़ोन रखते ही पहले से भारी मन  और भी व्यथित हो उठा  एक नारी जितना भी कर ले  पर उसकी कोई कदर नही होती हैं   सुबह सुनील से निशा की बहस भी  उसकी बहन को लेकर हुई  थी  यह पुरुष लोग अपने रिश्तो के प्रति कितने सचेत होते हैं ना  स्त्री के लिए घर  आने वाले सब  मेहमान एक से होते हैं  परन्तु पुरुषो के लिय अपने परिवार के सामने उसकी स्त्री भी कुछ नही होती,न ही अपना घर , खाने के स्पेशल व्यंजन  होने चाहिए , पैसे पैसे को दाँत  से पकड़ने वाला पति  तब धन्ना सेठ बन जाता हैं  पत्नी दिन भर खटती  रहे  पर  उसपर अपने परिवार के सामने एकाधिकार एवेम आधिपत्य दिखाना पुरुष प्रवृत्ति होती हैं 
                                                            सुनील की बहन  रेखा  सर्दी की छुट्टियाँ   बीतने के लिय  उनके शहर आने वाली थी  सुनील चाहता था कि  उनका कमरा  एक माह के लिए उनकी बहन को दे दिया जाए   निशा इस बात के लिए राजी नही थी  पिछली बार भी दिया था उसने अपना कमरा  दीदी को रहने  के  लिए .....
                                                                                                              दिन भर रजाई में पड़े रहना  पलंग के नीचे मूंगफली के छिलके , झूठे बर्तन , गंदे मोज़े  निशा का मन बहुत ख़राब होता था  काम वाली बाई भी उनके तीखे बोलो की वज़ह से उस कमरे की सफाई  करने से कतराती थी . निशा के लिए सुबह स्नान के लिए  अपने एक जोड़ी  कपडे निकलना भी मुश्किल हो गया था तब .. उनके जाने के बाद जब निशा ने अपना कमरा साफ किया तो तब जाना था  उसके कमरे से अनेक छोटी छोटी चीज़े गायब थी  उसके कई कपडे ,  बिँदिया , पलंग के बॉक्स से चादरे ....
 मन खट्टा हो गया था उसका पिछले बरस  कि  अबकी बार आएँगी तो इनको अपना कमरा बिलकुल नही दूँगी सुनील मान लेने को तैयार ही न था  इस बार उनकी बहन छोटे कमरे में   रहे .
"                                                        निशा का मन अतीत में  जाता हैं अक्सर . मायका तो उसका भी हैं  वोह कभी दो दिन से ज्यादा के लिए नही गयी  सुनील का कहना हैं ....
".रही थी न 22 साल उस घर में    
अब भी तुम्हारा मन वहां ही क्यों रमता है ? 
अपना घर बनाने की सोचो बस !!
अब यही हैं तुम्हारा घर ..."
अब .जब भी जाती हैंमायके तो  अजनबियत का अहसास रहता हैं वहां , माँ बाबूजी उम्र के उस पड़ाव पर हैं जहा उनके शब्दों का कोई मोल नही अब , जैसा बन जाता हैं खा लेती हैं निशा  . बच्चे अगर जरा भी नखरे करे उनको आँखे तरेर कर चुप करा देती हैं  चलते  हुए माँ मुठ्ठी में बंद कर के  कुछ रुपये थमा देती हैं  और एक शगुन का लिफाफा 4 भाइयो की बहन को  कोई एक भाई " हम सबकी तरफ से " कहकर थमा देता हैं  ............न कुछ बोलने की गुंजाईश होती हैं न इच्छा .

                                       किस्मत वाली होत्ती हैं न वोह लडकिया  जिनको मायका नसीब होता हैं  जिनके मायके आने पर खुशिया मनाई जाती हैं , माँ की आँखों में परेशानी के डोरे नही खुशी के आंसू होते हैं 
टी वी पर सुधांशु जी महाराज बोल रहे थे  बहनों को जो मान -सम्मान मिलता हैं   जो नेग मिलता हैं  उसकी भूखी नही होती वोह  बस एक अहसास होता हैं कि इस घर पर आज भी मेरा र में आज भी हक हैं 
 निशा ने झट से आंसू पोंछे ,  फ़ोन उठाकर सुनील को  उनके दूकान  के नंबर पर   काल किया 
 "सुनो जी , बाजार से गाजर लेते आना , निशा दी कल शाम की ट्रेन से आ रही हैं  गाजर का हलवा बना  कर रख दूँगी उनके चुन्नू को बहुत पसंद हैं   "
  कमरे की चादर बदलते हुए  निशा सोचने लगी  ना जाने रेखा दीदी  ससुराल में किन परिस्तिथियों में रहती होगी  कैसे कैसे मन मारती होगी छोटी छोटी चीजो के लिए  . शायद यहाँ आकर उस पर अपना आधिपत्य दिखा कर उनका स्व संतुष्ट होता होगा . कम से कम किसी को तो मायका जाना सुखद लगे और खुश रहे उसके मन का रीता कोना !!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!! 


 नीलिमा शर्मा