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20 अक्टूबर 2012

Ab kya!!


"रमा यह सब क्यों हुआ मैंने कभी सोचा भी नही था ऐसा हाय रे मैं मर क्यों नही गया यह दिन आने से पहले!!!!!!!!!!!!!!! "
आंसू भरी आँखों से विकास ने रमा के झुर्रियो  भरे हाथो को थामा  और  लाचारगी से उसकी तरफ देखने लगा .
  कोने वाले कमरे के बिस्तर पर  कृशकाय  रमा   विकास के कपकपाते हाथो को थामे  टकटकी लगाये छत  को देख रही थी
                                                 याद आने लगे उसको वोह पल जब उसने एक दुल्हन बन इस आँगन की दहलीज़ पर पाँव  रखा था , 8 भाई-बहनों में  4 नम्बर की बहु थी वो ....तब जमाना ही अलग था . शादी तब सिर्फ पति से नही पूरे परिवार से होती थी .....पति से मन का मिलन  हो न हो देह का मिलन हो जाता था और पूरे परिवार से मन मिले न मिले  सर झुकाना पड़ता था  . बहुत ही अरमान लेकर उसने भी अम्माजी की देहरी पर माथा टिकाया था ........
                                                            अम्मा जी पूरे रॉब-दाब  वाली  बेहद खुबसूरत  महिला थी क्या मजाल थी कि  कोई बहु या बेटा  उनके सामने एक शब्द भी बोल जाये . चक्करघिन्नी सी घूमती  सब बहुए  दिन भर काम मैं लगी रहती  जिसका काम अम्माजी का जरा भी नापसंद आता उसका रात को पति से पिट जाना लाजिमी था उस घर मैं .... यह रोज का तमाशा था  बस सोचना यह होता था कि आज किसका नंबर लगेगा . किसी को किसी से कोई शिकायत नही किसी को किसी से कोई हमदर्दी नही थी  .साल दर साल परिवार बढता  गया जगह कम होने लगी तो अम्मा जी ने  सबसे बड़े बेटे का चोका अलग कर दिया  शादी के 5 साल बाद रमा को भी पति के संग चार बर्तन देकर "जाओ अपनी घर गृह्स्थी खुद बनाओ चलाओ "कह कर घर से बाहर  का रास्ता देखा दिया गया था
                                      कैसे एक कमरे मैं रमा ने अपने बच्चे पाले कैसे दिन भर लोगो के स्वेटर बन कर पैसे कमाए विकास को कुछ पता नही उसका काम था दिन भर दफ्तर मैं रहना उसके बाद अम्मा जी के घर हाजिरी ....लोटने तक बच्चे नींद में होते . कभी साथ बैठकर विकास ने दो मीठे बोल भी न बोले
                ओरत दिन भर काम कर सकती हैं हैं . कम खा सकती हैं एक जोड़ी  कपड़े मैं गुजरा कर लेगी बस शाम के वक़्त अगर पति दो मीठे बोल बोल दे . लेकिन यह बात हर पुरुष को कहाँ समझ मैं आती हैं .............जीवन का योवन वो दंभ मैं गुजर देता हैं कि  कि  मैं पुरुष हूँ  सृष्टि का रच्येता!!! ओरत तो सिर्फ जमीन हैं .जबकि वोह ज़मीन ही 9 महीने तक उसके बीज को अपनी कोख में अपने खून से सींचती हैं  और तभी उसको मिलता हैं  अपना वारिस ....और उस वारिस को  वोह गोद में लिए ऐसे खुश होता हैं जैसे सारा दर्द उसी ने झेला हो  और उस नारी की पीडा  को समझने के लिए उसके साथ तब भी किसी कोने वाले कमरे का अकेला सा बिस्तर होता हैं
                                                 रमा ने भी 4 बेटो को जना .खून का असर कहो या माहौल का बेटे बाप से भी सवा सेर निकले . बेटिया  थी 4 जो उसके दुःख को जरा समझती थी . अन्दर से अकेली रमा को कब दिल का रोग लगा कोई नही जानता था . दिन थे के गुजर ही रहे थे ....आज घर मैं कोई कमी नही न पैसे की न जगह की  बस कमी थी तो आज भी उस संवेदना की जो कभी इस घर के पुरुषो ने रमा को कभी दी नही .सब बेटे भी अब बीबियो वाले थे खुद चाहे आज भी बीबी को जूतों से पिट ले पर कोई उनको कुछ कहे तो एक दुसरे का सर फोड़ने को तैयार ...और आजकल की बहुये  तो माशाल्लाह ...........खुद काम  करे न करे .बेटो के सामने रमा को लपकती झपकती" कि  माजी
बेठो न हम हैं काम  करने को , आप आराम करिए न ."...और बेटो के  पलट जाने के ......."अरे मैं तो थक गयी हु माँ आप चाय तो बना लाओ .."........माँ नौकरानी बन काम करती .....
                                             उस सुबह हद ही हो गयी ..........पता नही कौन   सा शनि आज सजा दे रहा था  या पिछले जनम के बुरे करम होंगे कोई . सुबह चाय बनाते वक़्त रमा के काँपते  हाथो से ढूध  का पतीला गिर गया  थोड़ा  सा ढूध  पोते की बाह पर छींटे बनकर गिर गया .बच्चा बाल  सुलभ होकर जोर से चीखा .......... बेटे ने आव देखा न ताव ...माँ पर हाथ उठा दिया ........................ एक बेटे अपने बेटे का दर्द न देखा गया ............
                          अपने कमरे में रोती  रमा ने पूरा दिन खाना नही खाया  न ही घर- भर मैं कोई पूछने आया . दो दिन बाद विकास को ही सुध आई  सारी  बात जान  लेने पर उम्र के इस पड़ाव पर पहली बार उसका पौरुष जागा

  उसने जब बेटे से जवाब तलब किया तो ....जो नही होना चाहिए था वही हुआ ....................... अपने बूढ़े  बदन पर नील के निशाँ लिए और लहुलुहान आत्मा से विकास रमा के पास लौट  आया  
                                         इंसान दुनिया से हर कदम पर लड़ लेता हैं परहारता  हैं वोह सिर्फ अपनी ही संतान  के सामने !!  सारी  उम्र वोह खुद अपनी पत्नी को वोह सम्मान नही देता जिसकी हक़दार वोह होती हैं  तो बच्चे कैसे अपनी माँ को सत्कार करे जिसको उसने उम्र भर त्तिरस्कृत  होते देखा हो
                                               रमा का हाथ थामे विकास  खड़ा था उस चौराहे पर ..जहा सोच के सब रस्ते खंडित हो जाते हैं  कि  कहा क्या गलत हुआ ......................  और शून्य मैं  ताकने के सिवा कुछ भी नही रहता ................................................ और आज जख्मी था  आज दोनों के मन का कोना .........अपनी अपनी परिधि मैं .....................................................................

17 अक्टूबर 2012

Jhumki


आज फिर झुमकी रो पड़ी ............आंसू टप-टप बह रहे थे . अहसासों का कोर कोर मानो  लहुलुहान था , आखिर क्यों उसका हुक्का-पानी बंद कर दिया मोहल्ले वालो ने     
 मन के आंसू  धुधली छाया लिए  उसे बीते साल की यादो मे ले गये   ........ सब मोहल्ले वालिया  नुक्कड़ पर खड़ी थी      कभी इसकी कभी उसकी   बुराई की जा रही थी  . उसको कतई पसंद नही था यह सब करना  जब उसको सबने आवाज लगायी तो उसने आने से मना कर दिया   के घर में ढेरो काम पड़े  हैं मुझे ट़ेम नही यहाँ आने का     . बचपन से अपनी किताबो मे घुसी रहने वाली झुमकी मोहल्ले की सबसे ज्यादा पढ़ी लिखी ओंरत थी  . हर  वक़्त मोहल्ले के चोराहों पर आते जाते आदमियों की नज़रो का स्वाद बन'ने की अपेक्षा उसको सिलाई करना पसंद था     घर का हर कोना उसकी सुघड़ता   की गवाही देता था . छोटे से घर में अपने दो बेटो के साथ बहुत खुश रहती थी  हर  मिया-बीबी की तरह किसनवा से लड़ भी लेती थी  तो बच्चो की शरारत पर उनको पीट भी देती थी हर तरह से आम  औरत थी बस यह चौराहा   उसको पसंद नही था . धीरे धीरे मोहल्ले की ओरते जो कभी उस से बात करने मे फख्र महसूस करती थी  अब उसको घमंडी कहने लगी उसके सुथरे कपडे सबकी आँखों मैं खटकने लगे सबके मर्द" झुमकी को देख जरा "कहकर अपनी बीबियो    को चार बात कहने लगे थे . पिछले बरस उसने गीतली के घर कीर्तन मैं सुमनी को उसकी सास/पति  की बुराई करने से टोक दिया  तो सबने उसको स्पेशल ओंरत का तमगा पहना दिया  जैसे सास/पति  की बुराई  करना हर औरत   का  अधिकार हैं  अब किसनवा अगर प्यार करता हैं तो क्या हुआ अगर गलत काम पर गुरियता भी हैं  जब बख्त आता हैं तो झुमकी भी तो उसको खूब सुना देती हैं  यह बात हर औरत  को समझ नही आती सबकी सब अनपद औरत  नारी मुक्ति आन्दोलन की नेता बनी फिरती हैं एक का मर्द मारे सब इकठ्ठी हो जाती हैं खुसर-फुसर करने को .पर झुमकी ने न कभी किसी को बुलाया न कभी किसी के यहाँ चुगली करने गयी .बस यही से उसको घमंडी कहा जाने लगा धीरे धीरे सब  को लगने लगा के  यह हमारे जैसे क्यों नही      और   


                                              आज  अरसे बाद उसने अपने घर मे माता का कीर्तन कराया .............. दो चार बुजुर्ग औरते   आई बाकि कीर्तन मण्डली वालियों ने भी अलग ढोलक बजा ली  के  बहुत बनती थी न  बजा ले घंटी  मंजीरा अपने आप .............किसी ने नही सोचा शक्ति औरत में  खुद विराजमान  हैं .........क्यों इक दुसरे की दुश्मन बनी हैं वोह ...............  क्या कसूर रहा उसका . क्यों नही वोह एक आम ओंरत बनकर सबकी बातो का काट  पाती . क्यों नहीं  सबके सामने कुछ और  पीछे कुछ और बन जाती हैं  क्यों आज वोह अकेली हैं माँ के इस दरबार मैं . क्या खुद को बदल डाले या इस मोहल्ले को या फिर खुद मैं शक्ति बन जिए . डोल गया आज उसका मन का विश्वास ............... जार जार रोता रहा आज झुमकी  के मन का कोना ..........साथ ही हर उस ओंरत के मन का कोना जो खुद मैं जीना चाहती हैं  और ढूढ़ रहा हैं अपने अच्छे होने के सवाल का जवाब ................................

3 अक्टूबर 2012

 कल रात से  सर में  दर्द था सुबह देर तक सोयी रही और  फिर जोरो की आवाज़ ने डरा कर उठाया ..... कितना जोरो से चिल्लाती हैं रहिमन काकी ... सब उनको सुबह वक़्त से चाय नही मिलती ......... बिंदाल नदी के किनारे बनी झुग्गियो  में  अक्सर उनकी चीख पुकार सुनाई दे जाती हैं ...... 
                                                                 मैले से कपडे पहने काकी दिन भर बाहर धूप में बेठी रहती हैं .सर्दी का आगाज शायद उम्र से महसूस होता हैं .अब नयी उम्र के बच्चो को आज भी कितनी गर्मी लगती हैं  ,काकी को बस एक ही लत हैं, सुबह सवेरे  उठते ही चाय का  गिलास ...उस पर उसमें  डाला हो ढेर सारा  मीठा , सर्दी गर्मी  उनको सुबह ६ बजे चाय चाहिए उसके बाद पूरा दिन उनको वक़्त से कोई लेना देना नही .  आज शायद नुक्कड़ का चाय वाला आया नही हैं .
                                          कोई नही जानता कि रहिमन काकी किस उम्र में देहरादून आई थी .  उनका असली नाम क्या हैं रहीम काका की ब्याहता थी वोह सो  सबकी रहिमन काकी बन गयी कालोनी के बुजुर्ग  याद करते हैं के जब बिंदाल नदी साफ हुआ करती थी ,इस कदर गंदगी नही होती थी यहाँ . तब से यहाँ पर ही हैं काकी ........... रहीम चाचा  किसी बल्ब बनाने के कारखाने में काम करते थे . छोटी सी कच्ची झोपरी में काकी  दिन भर काम में लगी रहती थी साफ सुथरा चोका . गोबर से लीपा सहन , साफ धुले कपरे पहने काकी जब पास के मोहल्ले में  जाती तब  खुद को अभिजात्य समझने वाली ओरते भी उसके सलाम का जवाब देने से खुद को नही रोक पाती थी .  किसी को कही जाना होता था तब रहिमन काकी उनके घर की चोकीदार बन जाती थी बस एक-दो गिलास चाय की रिश्वत लेकर . किसी के घर काम ज्यादा हो जाये तब भी रहिमन काकी उनके घर जाकर  बहुतेरे काम सम्हाल लेती थी ..... गैर जात थी न   सो रसोई में उनका परवेश निषेध होता  पर हर काम उनका दखल सबसे पहले . याद हैं मुझे वोह पहला दिन जब  जब मैंने ससुराल की दहलीज़ पर पहला कदम रखा था ..... दुल्हन कह कर बुलाने वाली को जब मैंने नज़र उठा कर देखा तब गोरी सी  दरम्याने कद की  गहरे हरे रंग का चुड़ीदार suit पहने रहिमन काकी मुझे ससुराल के सब जनों से अलग से लगी . कुछ था जो मुझे अंदर तक भा गया था . शायद उनका दुल्हन कहने का अंदाज़ या उनकी नफासत भरी बोली  या आँखों से सराहती  एक सुरक्षा कवच सी   माँ जैसे उपस्तिथि . बस एक अनजाना सा रिश्ता सा जुड़ गया उनसे .जब भी उनको देखा  होंठो से बरबस सलाम निकल गया . उनका वोह   अरे चाँद से बेटो की माँ बनोगी दुल्हन  .ऐसा आशीर्वाद आज भी याद आता हैं और अपने बेटो को देख उनकी दुआ कुबूल हुए सी लगती हैं .
                                                         अब रहिमन काकी हर वक़्त काटने को डोडती   हैं  किसी का कोई ही लफ्ज़ उनको आगबबूला करने को काफी होता हैं काकी झोपडी ख़ाली हैं क्या?किराये पर दे दो ,? कब जा रही हो गुजरात ?
वोह झोपडी  जो कभी ताजमहल थी उनका, उनके सपनो का, जहा वह वोह रहीम चाचा के साथ रहती थी .आज वीरान हैं ....वह अब कोई झाड़ू नही लगता अब वह खाना नही पकता 
 बस काकी एक दिया जलाती हैं वहा .रोजाना शाम को .............आस का दिया ...............रहीम चाचा कह गये थे कि गुजरात  से जल्दी लौट कर आऊँगा   वहा ज्यादा काम मिलता हैं कारीगरों को ..............................जाने कितने बरस बीत गये .................. उम्मीद का दिया आज भी जलता हैं ............ और आज भी इंतज़ार करता हैं रहिमन काकी के मन का एक कोना ..

31 जुलाई 2012


कल मैंने बाजार से खरीदी ५ राखिया ,२४ धागे , जब
दुकान दार भी हसने लगा क्या पूरे मोहल्ले के भाई बना लिए अपने
कितने पैसे कमा लेती हो?राखी के ही एक रोज में !!!गुस्सा तो इतना आया गुस्सा तो इतना आया के पूछु के क्या तुम अपनी बेटी को बहन को पैसे देते हो तो गल्ले में कुछ कम हो गया सोचते हो . क्या पैसे सगी बहन चचेरी मौसेरी बहन का भेद जानते है .क्या पैसे मिलना जरुरी है राखी पर भाई बहन के सर पर हाथ रख रख देता है तो बहन को सब मिल जाता है . बहन जब भाई को एक टिका लगाती है माथे पर भाई की किस्मत उचे मुकाम को चूमे बस यही दुआ करती है

मेरी अपनी बेटी नही पर मेरे बेटो की कलाई कभी सूनी नही रही हाथ भर राखी पहनते है दोनों .मामा मौसी की चाचा की बेटी उनको राखी भेजती है ...
राखी क्या सिर्फ सगे भाई की कलाई जानती है
हमने बचपन से अपने भाई के साथ,चाचा मौसी के बेटो को भाई माना है
हर सुख दुःख में उनको अपने साथ माना है आज भी अगर में जरा भी परेशान होती हु .सब भाई मेरे साथ होते है
मेरी माँ ने कभी फर्क नही सिखाया के यह सगा भाई है यह चाचा का बेटा
यह मासी का , आज ब्बच्चो को देखती हु के उदास हो जाते है के हमारी बहन नही है या भाई नही है
यहाँ कमी है उनके परेंट्स की . जो उन्होंने अपने बच्चो को रिश्तो की आह्मियत नही सिखाई आज चाचा का घर एक अलग एकै बन गया है पर त्यौहार पर क्यों नही उसकी बेटी को राखी पर बुलाया जाता है .शायद भोतिकता इतनी हावी हो गयी है के हम हल्दीराम में जाकर १००० का खाना खा कर आयेंगे पर चाचा के बेटी को कोण हर साल राखी का नेग दे. हम बच्चो को खुद ही नेतिक स्टार पर खोखला बना रहे है . छोटे परिवार है आजकल तो हर घर मई भाई या बहन हो जरुरी नही है इसलिए क्या हम अपने बेटो की कलाई पर उनकी उन बहनों से राखी क्यों नही बंधवाते है जिनका कोई भाई नही है ........देखिएगा आपके बच्चे कितनी प्यारी सी मुस्कान से दुनियादारी सिख जायेगे . जिन्दगी में व्यवहारिक होना जरुरी है पर रिश्तो को जिंदा रखने में पहल माँ को करनी होगी .... उम्मीद करती हु इस साल उन बहनों को भाई मिले एवेम उन भाइयो को बहन जिनकी सगी बहन नही है ...क्युकी रिश्ते दिल से होते है सिर्फ खून से ही नही तभी हमारे समाज में कुछ असमानता कम हो पायेगी , सभ्यता एवेम संस्कृति बनी रहेगी

2 अगस्त 2011

HOME MAKER

>KABHI kabhi life mai kuch aisa bhi ho jata hai .k jo socha bhi nhi hota ..............kuch bhi karne ka man nhi karta bas yu hi apne se batee karte karte mai us ke sath zor se jagar parhi aakhir hua hi kya tha jo mai itni biffar gyi ????????????
nhi kuch bhi to nhi bas usne muze aisa kah diya k mai apna apa kho bethi aurrrrrrrrrrrrrrrrrrrr bas .jo nhi kahna vi nhi chahiye tha sab kah diya
log itni choti soch kyo rakhte hai jo muh mai aaya kah dete hai kisi ki umar ,rishte ki parwah tak nhi karte . bas ab nhi bat karni muze .y jitna bhi manaye main unke sath ab bat nhi karungi na hi unko kabhi bulaoogi ..are hamko mazak samzha hai kya ..........ham bhi insaan hai
ham home maker hai to................ haan haan homemaker ....................... ham na ho to ghar makan ban kar rah jayega .rat ko ghar aakar sona n khana yahi to karna hai to wo hotel hoga ghar nhi ..
ghar banta hai ham se naki unse ........... aakhir wo kaisi inti bat bol sakti hai
haan sach kah rahi ho aap .................... k mai gusse mai hu par aap lhi socho jab wo subah uthte ho to sabse pahle bed tea ko kahe awaz lagate he.tab ham hi to dore dore chale aate hai bas off jane tak bas wo log hamara hi nam pukarte rahte ho n ham bhi chakkarghinni ki tarah idher-udher ghumte rahte hai . are bachcho ne kuch khaya k nhi ,bachche ne parae kiya tha ya nhi . are maanji ki dwa khatam ho gyi to tumko pahle se batana tha na .akhir tumko ghar mai rakha kyo hai ...........kuch kam nhi hota tumse ........... tumse achchi to wo ..............................................????????????? ............ bas .... ..... n mera man unke aansuo ke sath gamgin sa hone laga .
haan kai din se unki chikh ........pukar sun rahi thi apne drawing room mai bethe bethe ........ .akhir mrs rajesh kyo itna annoyed si lag rahi hai kabhi kabhi bhi uche swr mai na bolne wali n hamesha apne kam se kam rakhne wali ruchi [mrs rajesh] kyo itna aandolit hai bas yahi soch kar unke ghar chal parhi thi k isi bahane maanji ki tabiyat bhi pooch lungi
ghar mai enter karte hi baigan k bhurte ki smell se muze bhi bhukh lag aayi .,ghar sheeshe ki manid chamak raha tha maanji bhi tv k samne apne manpasand seriel dekh rahi thi mai chuchap ruchi k bed room ki taraf barh gyi ..dekha k kamara to chamk raha tha agar kuch fika tha to wo ruchi ka chehra
muze dekhte hi uske man se yahi shabd nikle jinko parh kar aap sab bhi udgwin ho uthe
mr rajaesh ko ab apni wife mai kuch khas nazar nhi aa raha tha .uski har qualities ab disqualities mai badal chuki thi , sheeshe sa ghar ab to bai bhi chamka sakti hai . unka homly hona ab unke liy curse ban gya tha ............wo faffak kar ro uthi kya mai home maker nhi kya nokri na karna mera gunah hai .kya mera koi contribution nhi is ghar ko swarne mai .................
.ghar aa kar soch mai parh gyi mai k aisa kyo socha rajesh ne........ kya jo lady job nhi karti uski koi ahmiyat nhi honi chahiy .kya ghar samhalna apne aap mai koi mahan kam nhi kya sirf working women hi smartly kam kar sakti hai . bas samay ka chakra chalta hi rahta hai .kuch din bad dekha k ruchi tezi se subah subah kahi ja rahi hai ,usko us waqt awaz dena uchit nhi laga so sham k waqt usko apne ghar bulaya ....... kitna kumhala si gyi thi ruchi is ek mahine mai hi .usne bataya k didi maine ek pvt company mai job dhundh li hai par rajesh ab khush hai muze poochna nhi chahiye tha fir bhi maine pooch hi liya ... . ruchi fiki si hansi haste hue boli ..di shuru shuru mai to rajesh ko bahut hi achcha laga .par jab mai rajesh se pahle hi nikal jati hu to usko khud hi nashta lekar khana hota hai ,uski har bat sun ne ka ab waqt nhi hai mere pas , bachche kya parh rahe hai y bas pooch hi pati hu roz check karne ka waqt hi nhi , khana bhi bas ek dal sabji hi ban pata hai ,ab roz rajesh n bachcho ko lunch k liy nai nai dish nhi de pati maanji ki teen din se choti nhi bana pai hu didi mere man se poocho k muze kitna guilt hota hai jab y sab kam mai nhi kar pati .aaj betiya k no. bhi kam aaye hai to tution bhi lagwani hogi na .kya karu mai sirf husband ko satisfy karne ko noukri karni parh rahi hai kya kam paiso mai achche se guzara nhi ho raha tha ,sab ho raha tha didi .par tab ham 20"inches TV mai khush they ab rajesh plazma k sapne dekh raha hai ham ghar mai saman to bhar lenge par mere bachcho k bhavishya ki cost par ...jo bachche school se aate hi har bat sunate they aaj unki bat sun ne ka waqt hi nhi hai mere pas . mai ye nhi kahti k noukri karna galat hai par didi har ghar ki apni jarurate n paristhitya hoti hai ..... ab is umar mai maanji ko bachcho ko khana garam karke dena parta hai .ab muze roz achche kapro ki jarurat hai ,ek bai bhi lagwani hai , kitna paisa bacha paogi mai .....haan ab rajesh muze apno dostoi mai proudly introduced karata hai k k meet my wife she is working in ........ uski hansi mai meri fiki si hansi chip jati hai n muze maile kapre ,guddi ka school project ,munna ki dose ki farmaish,n maanji ka pairo ka dard yaad aata hai bas kya ham samaj mai show off karne k liy job kare kya ham apni jarurate simit nhi kar sakte ,.....kya mai gar nokri na karu to kisi dusre aise insaan ko job nhi mil jayegi jiski job se pooora ghar chalega .......sirf ego satisfy karne ko noukri kyo ? mana k stree purush ek hai par har kam ka ek adhikari hota hai purush kama kar laye n stree us money ko samazdari se kharch kare ,bachcho mao sanskar de buzurgo ki achche se sewa ho kya inki koi mol hai ? .............................. mai soch mai parh gyi umar mai kitni choti hai ruchi par samazdar kitni..................kya ruchi job chor de ya karti rahe bas ye sab sochti mai ghar aa gyi .......... man aandolit ho utha ..par sach kahu aaj muze khushi hue k maine apni job chor di mere bachche muzse dil ki bat to kah pate hai ,mere in- laws ko akelapan to nhi bhogna parha , mere bachcho ko kisi tutor ki jarurat to nhi parhi apne hubby par pyar umar aaya k unhone mere har faile ka swagat kiya ..kisi jhuthi shaan ya bhotik cheejo ki lalsa k liy paiso ki mashin nhi banaya haan mai proudly kah sakti hu 'I M HOME MAKER. jarurat hai tabhi job karo . apni paristhityo ka akalan karna bahut jaruri hai ..............

30 अप्रैल 2011

Poorani yaad

Aankhe band karti hu to uski choti choti ungulia apne galo par mahsoos karti hu uska mulayam sa sparsh bhi ,kitne pyare they na uske nanhe nanhe paon, gora chitta mera raja beta . god mai uthaye nhi banta tha mujhse. bar bar palat kar dekhti thi k mera hi hai na . inki aankho mai umre pyar n chamati nazaro ne AHSAS dilaya k han nivi tu hi hai iski ab sab kuch .y tera hi ansh hai .. are abhi to maine khud ka bhi bachpan nhi jiya pooritarah se n mai khud ek bachpan ko janam de chuki hu . ... bahut payara pyara sa lag raha tha y sansaar . charo taraf khushiyaa hi khushiyaa thi badhaiyaa thi mithaiyaa thi , ghar mai naraz rahne wale inke apne bhi aaj mujhse khush they . sab zide kahi tirohit ho gyi thi k mujhe carrier banana hai .mujhe abhi parna hai mujhe job karni hai .sab bhool gyi thi :0 sab mil gya tha us nanhi si pyarai si surat mai . Maa ban jane ka sukh kya hota hai tab jan pai thi mai . maa shabd nhi hota ek AHSAS hota hai . MAA kora lafz nhi tha usko mai ji gyi thi bheetar tab ... choti choti anguli pakar chalna seekhana , nanhe nanhe pawo mai bar bar jute pahnana bar bar zid poori karna thake hone par bhi adhirat ko uske hilne par uth jana . sach ....... ...................................
Aaj yu hi box khola to usmai se ek poorani diary bahar nikal aai .arreyyy y to wahi note book hai jise maine apne pregnency days mai likha tha poore 8 mahine tak ... har din ka alag ahsas alag mood alag khushi .... ek larki k maa ban ne ki taraf barta har kadam usmai saf dikh raha tha kisi jagah lagta k uffffffff y mai thi itni ziddi . ahahahhahaha .. doosre shan agle page par laga y mai thi .itni pyari ........
jeewan mai alag alag phase aate hai har phase ko khul k jeena chahiye na ... un dino ko maine kitna khul kar jiya tha maine .
han mere bete mai khush hu tujhe pakar n tript hai mereMAN KA HAR KONA :))) LOVE U

28 अप्रैल 2011

रंगों की दुनिया

jindgi mai kai rang hote hai , mujhe bhi rango se pyar hai , khile khile se rang charo taraf bikhre hue hai mere , khud bhi to mai aakash ki anant gahraiyo tak faili hue neelima si hu jisaka na koi aadi hai na aanat hai , mai khud bhi aaj bhi pi k pyar mai rangi lal gulabi hu dhani rang ki churiyo ko lahrate hue , aaj bhi mamtatv ko niharte hue aaj bhi kuchi se sunhari ho jati hu umar ki chakili chandni mujhe aaorhne ko aatur hai .Rang hai k khatam nhi hote hai . kon kahta hai jindgi mai sirf sat rang hote hai .meri zindgi mai to rango ki bouchar hai . fir bhi kabhi kabhi mera man aklele mai kabhi is ranbirangi chadar ko aaurhe akele beth jata hai . kyu khud hi khud se akele ho jati hu mai . y kami sirf meri apni hai koi bhi iska zimmedar nhi nhi sab rang hai mere charo taraf ........fir bhi na janane kon sa rang talashta hai MERE MAN KA KONA SORRY FRDS MUJHE HINDI FONTS MAI TYPE KARNA NHI AATA