योगदान देने वाला व्यक्ति

24 जुलाई 2014

कौन कसूरवार ?

नयी नयी कलम थामी थी उसने , सबने सराहना शुरू कर दिया था " तुम अच्छा लिखती हो , लिखा करो ना " पंखो ने परवाज़ भरनी शुरू की ही थी कि पति महोदय की आँखे घुमने लगी हर वक़्त उनकी भ्रकुटी तनी रहने लगी , बूढ़ी चिड़िया ने उनके सब काम वक़्त पर करने शुरू कर दिए , खाना पीना कपडे सब , ताकि कुछ पल जो वोह अपनी बंद मुठ्ठी में बिखरे शब्द अपने सामने फैला कर एक माला गूंधती हैं उसकी महक में खुद के जीने का सबब ढूढ़ सके , लेकिन सय्याद कैसे सहन कर सकता था जिस चिड़िया के पर उसने बरसो पहले काट दिए थे आज कटे पंखो से उड़ने की कोशिश करने लगी हैं , चिड़िया बेचारी भोली सी अनजान थी उसे लगता उसने सब कर्तव्य अच्छे से निभाये उम्र भर बच्चे भी ब्याह दिए हैं अब तो अपने लिय जी सकती हैं सब उसकी उड़ान देख कर खुश होने पर उसको शाबाशी देंगे , वक़्त के साथ चिड़िया में आत्म विश्वास आने लगा और लेखनी में ताक़त , आभासी दुनिया हैं स्त्री -पुरुष सब उसका लिखा पढ़ते और तारीफ़ करते , उसे साहित्यिक सस्थाओं में बुलाया जाने लगा लेखनी की बढती ताक़त को देख घर भर में खलबली मचने लगी उसका स्वतंत्र व्यक्तित्व कैसे बन जाए ? बहुत नागवार था अब उसका लिखना उसका किसी से बात करना .....पुरुष सय्याद ने अपनी चिरपरिचित चाल चली औरफेंकदिया पासा तुम चरित हीन होती जा रही हो चरित्रहीन लोगो से घिर रही हो .......... स्त्री घर छोड़कर माँ के घर आगयी , सब कुछ स्वीकार्य रहा पिछले ३० बरस में ,पर सवाल चरित्र का था अब बहु बेटो के सामने इस उम्र मैं ऐसे घिनौने इलज़ाम ...... बेटे भी माँ के विरुद्ध हो गये की उनकी पत्नियां भी ऐसी ही हो जायेगी तो ...........  उम्र  सपने तोड़ देती हैं उमरभर संजोये हुए .सिर्फ स्वालंबी न होने की वज़ह से 

शांत / चुप्पी

":एक बार बोल रह कर तो देखो !! "
"मैं चुप ही रहती हूँ हमेशा !! "
"मौन की भाषा में लफ्ज़ कहना तुमको बाखूबी आता हैं .तुम्हारी आँखे बोलती हैं तुम्हारी मुद्राए बोलती हैं बस तुम चुप रहती हो ! "
 " उफ़ कभी तो लफ्जों से कुछ कहो कोई शिकायत ही कर दो  कोई डिमांड ही कर दो "
 "ऐसे कैसे जिन्दगी  कटेगी हमारी भविष्य में "
आज फिर कॉफ़ी हाउस में एक मौन पसर गया मिलने पर ..
हर मसले का हल मौन नही होता 
कभी कभी शब्द भी जरुरी होते हैं ......
"चलो चलते हैं . मेट्रो आती ही होगी मुझे आज गुडगाँव जाना हैं तुम तो नॉएडा ही जाओ गी ना "

हम्म सर हिलाते दोनों चल दिए अपने अपने रस्ते पर .....
 उसे शांत लडकिया पसंद थी विवाह के लिय .................

ख़त

धौंकनी सी चलती थी मेरी साँसे जब डाकिया तुम्हारा ख़त मेरे हाथो में थमाता था और दरवाज़े की ओट में जाकर मैं ख़त पढ़ा करती थी एक बार दो बार तीन बार ..........नही बार बार लफ्ज़ -दर लफ्ज़ याद हो जाता ख़त फिर भी आँखे ख़त के लफ्जों पर घुमती रहती थी  अब तो कोई ख़त भी नही लिखता  
, आज माँ का फ़ोन आया कि पहले का ज़माना अच्छा था ख़त तो आते थे तुम सबके, अब तो तुम कॉल करती हो किसी का मन करता हैं या याद रहता तो बता दिया जाता हैं वरना मैं तड़पती रहती हूँ ना जाने कैसी हो तुम ? अब न मुझे नंबर याद रहते न सेल फ़ोन से कॉल करनाआता हैं .....मन भीग उठा . सो बेटे से कहा चलो नानी को आज एक ऐसा ख़त लिखो कि उनका मन खुश हो जाए ...जानते हो उसने क्या लिखा ........." बड़ी माँ ---- आपके हाथ के आलू के पराठे खाने का मन कर रहा हैं , कब आऊ ? चलो इसी सन्डे आ ही जाता हूँ ,बाय " उफ्फ्फ्फफ्फ्फ़ 

फ़िक्र


"मरजानी!!! खसमा नु खानी !!! 
किथ्थे गयी सी !!"
"बेबे !! ओ निक्की घरे गयी सी !!" नोट्स लेन दस के तान गयी सी काके नु " 
" काके तू दास्या नि बीबी नु "
माँ के पीठ पर पड़े जोरदार प्रहार से मिन्नी बिलबिला उठी और बेबस होकर माँ और काके की तरफ देखने लगी 
" कदों दस के गयी सी !! तू तान उस मोटरसाइकिल आले नाल गप्पा मारदी सी जदों मैं तेरे कोलो मैग्गी मंगी सी "
"मैं कद्दो गप्पा मारियाँ . झूठ न बोल उनने तान सरदार मिल्खा सिंह का घर पुचेया सी मैं दस दित्ता बस " .
"तू क्यों दसस्या??मेनू कहन्दी मैं दस देनदा " काके ने माँ की तरफ देखते हुए कहा
"चुन्नी पाके तेरो कोलो बार नि निकला जांदा .........ते वीर नु कहन्दी ओह गल करदा ..आज तो बाद जे तू किसे निक्की /मिक्की दे घरे गयी बिना वीर दे ते मैं तेन्नु इससे जमीन इच दब देना .पियो तेरा बार रहंदा .कल्ली मैं किवे सँभा तेन्नु !! माँ ने दहाड़ लगायी
हाय रब्बा एक सादा ज़माना सी कल्ले पन्ज पिन्दा दी गेड़ी मार लेनदे सी .......
माँ ने अखबार को चूल्हे में लगा दिया जिसपर मोहन गंज में हुए बलात्कार की नंगी तस्वीरे छपी थी .उत्तर प्रदेश हो या बिहार या पंजाब .................सबको अपनी बेटियों की फ़िक्र होने लगी.....

10 मई 2014

बाबल अस्सा उड़ जाना

"साडा चिड़िया डा चंबा वे बाबल अस्सा उड़ जाना ".. गीत की धुन बज रही थी मस्तिष्क में और रमेश की आँखों से अविरल आन्स्सुओ की धारा बह रही थी , क्यों भेज दिया उसने परदेस अपनी चिड़िया सी बेटी को ब्याह कर ,जहाँ उसे एक दिन भी पत्नी का सुख न मिला बस एक नौकरानी बनी अपने पति और उसकी गोरी पत्नी की सेवा करती रही , परसों रात उसका फ़ोन आया था कि पापा अब थक गयी हूँ मुझे ले जाओ आकर , बेटी की करुण पुकार सुन कर तुरत फुरत में टिकेट ली और पहुँच गये फ्लोरिडा . बेटिया पिटा की धड़कन होती हैं उनके हंसने रोने से हार्ट बीट बढतीकम होती हैं बेटी की विदाई पर उसके ससुराल के सामने हाथ जोड़कर खड़ा रहने वाला पिता सामने बेटी की मृत देह देख कृन्दन कर उठा . अब के बरस भैया को भेज दे ओ बाबुल गाती बिटिया के शब्दों का दर्द क्यों नही पहचान पाए .जा बेटी घर आपने कहकर क्यों उसको पराया कर दिया आज पिता रो रहे हैं जार जार .......बेटी को पराया धन समझ कर ...उसको भी तो अपने खून से सींचा था उसको भी माँ ने ९ माह ही गर्भ में रखा था तो आज बेटियाँ चिड़िया जैसी क्यों और बेटे शेर जैसे क्यों ?आज पिता का दिल समझ पा रहा था गाने के बोल के अर्थ . "साडी वड्डी उड्दारी वे अस्सी तेरे वेढ़े नही आणा"

11 अप्रैल 2014

संस्कार और रिश्तो को निभाने की काबिलियत

"उफ़ ! कितना काम हैं , मैं तो जैसे नौकरानी बन जाने के लिय आई हूँ इस घर में , हर कोई आता हैं हुक़म देकर चला जाता हैं यह बना दो , वोह बना दो "
मीनू घर भर को समेट'ते हुए खुद से बडबडा रही थी | कल ननद जी आरही हैं अपने बेटे के लिय लड़की देखने के लिय , अब मायके में मीन मेख निकालना तो बनता हैं उनका ,
घर को साफ करके उसने ननद की नजर से घर को देखने की कोशिश की और खुद को कहा " माँ ज्यादा घर साफ़ रखती थी ना भाभी , और खुद से खुद मुस्कुराती हुयी नहाने चल दी
पूरा घर गुलज़ार हो उठा था चहक से , बेटिया कितनी भी उम्र की हो जाए मायके में उनकी आवाज़ चहकती सी लगती हैं , लड़की वाले मिलने के लिय आ चुके थे , रसोई घर से प्लेटो का आना जाना लगा हुआ था , मीनू के अलावा सब लोग बैठक में जमे हुए थे अपना नाम सुनकर मीनू दरवाज़े की ओट में खड़ी हो गयी
" देखिये !! ऐसा कुछ भी नही हैं , जरुरी नही पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सब लोग दबंग ही हो या घर भर में रॉब जमाते फिरते हो , अगर आपने अपनीबेटी को अच्छे संस्कार दिए होंगे तो वोह घर बनाकर रखेगी नही तो मैं किसी भी शहर की लड़की ले आऊ क्या गारन्टी हैं की वोह घर बनाकार रखेगी , मानती हूँ कि हर शहर का अपना एक कल्चर होता हैं संवाद की अदायगी होती हैं पर घर के संस्कार सबसे उपर होते हैं | हमारी भाभी एक बहुत ही छोटे शहर की हैं इसने जैसे घर सम्हाला हैं कोई नही कह सकता कि यह किसी से कमतर हैं "
मीनू की आँखे अविरल बहने उठी यह वही ननद रानी हैं जो कहती थी छोटे शहर की लड़की हो चुप रहा करो .हमने तो कान पकडे अब पश्चिमी उत्तर प्रदेश की लड़की ना लाये कभी
सच ही तो हैं इंसान के

संस्कार और रिश्तो को निभाने की काबिलियत मायने रखती हैं रहने की जगह नही

12 मार्च 2014

मेरी तुलना

"आज फिर वही आलू मटर बोर हो गया मैं ऐसी सब्जियों से "
" कभी पिज़्ज़ा भी बनाया आपने कभी पास्ता बनाओ , शर्म आती हैं सब बच्चो के सामने आपना लंच बॉक्स खोलते , जब देखो पराठे और सब्जी .शामक की माँ हमेशा नयी नयी सब्जिया बनती हैं रोजाना उसका लंच बॉक्स नए व्यंजन से भरा होता हैं " 
जाओ आज मैं स्कूल नही ले जाऊँगा कुछ 
और शाश्वत की ऐसी बेरुखी तोड़ गयी सुधा को भीतर तलक 
माँ है ना " गृहशोभा ' से देखकर उसने आज पास्ता बना ही लिया लंच में और जब बेटे के सामने परोसा तो उसकी चमकती आँखे देख कर मन बाग बाग हो उठा
"बेटा आज रिपोर्ट कार्ड मिला होगा दिखाओ तो "
लो माँ पर अब शुरू मत हो जाना की बाकी बच्चो के नम्बर कितने आये , मैं मैं हूँ किसी से मेरी तुलना नाकिया करो , हर कोई पढाई में एक्सपर्ट नही होता ना "
सुधा अवाक् थी मन कह उठा था चुप

जुबान से " बेटा हर माँ भी तो विदेशी खाने बनाने में एक्सपर्ट नही होती "