योगदान देने वाला व्यक्ति

3 अक्तूबर 2012

 कल रात से  सर में  दर्द था सुबह देर तक सोयी रही और  फिर जोरो की आवाज़ ने डरा कर उठाया ..... कितना जोरो से चिल्लाती हैं रहिमन काकी ... सब उनको सुबह वक़्त से चाय नही मिलती ......... बिंदाल नदी के किनारे बनी झुग्गियो  में  अक्सर उनकी चीख पुकार सुनाई दे जाती हैं ...... 
                                                                 मैले से कपडे पहने काकी दिन भर बाहर धूप में बेठी रहती हैं .सर्दी का आगाज शायद उम्र से महसूस होता हैं .अब नयी उम्र के बच्चो को आज भी कितनी गर्मी लगती हैं  ,काकी को बस एक ही लत हैं, सुबह सवेरे  उठते ही चाय का  गिलास ...उस पर उसमें  डाला हो ढेर सारा  मीठा , सर्दी गर्मी  उनको सुबह ६ बजे चाय चाहिए उसके बाद पूरा दिन उनको वक़्त से कोई लेना देना नही .  आज शायद नुक्कड़ का चाय वाला आया नही हैं .
                                          कोई नही जानता कि रहिमन काकी किस उम्र में देहरादून आई थी .  उनका असली नाम क्या हैं रहीम काका की ब्याहता थी वोह सो  सबकी रहिमन काकी बन गयी कालोनी के बुजुर्ग  याद करते हैं के जब बिंदाल नदी साफ हुआ करती थी ,इस कदर गंदगी नही होती थी यहाँ . तब से यहाँ पर ही हैं काकी ........... रहीम चाचा  किसी बल्ब बनाने के कारखाने में काम करते थे . छोटी सी कच्ची झोपरी में काकी  दिन भर काम में लगी रहती थी साफ सुथरा चोका . गोबर से लीपा सहन , साफ धुले कपरे पहने काकी जब पास के मोहल्ले में  जाती तब  खुद को अभिजात्य समझने वाली ओरते भी उसके सलाम का जवाब देने से खुद को नही रोक पाती थी .  किसी को कही जाना होता था तब रहिमन काकी उनके घर की चोकीदार बन जाती थी बस एक-दो गिलास चाय की रिश्वत लेकर . किसी के घर काम ज्यादा हो जाये तब भी रहिमन काकी उनके घर जाकर  बहुतेरे काम सम्हाल लेती थी ..... गैर जात थी न   सो रसोई में उनका परवेश निषेध होता  पर हर काम उनका दखल सबसे पहले . याद हैं मुझे वोह पहला दिन जब  जब मैंने ससुराल की दहलीज़ पर पहला कदम रखा था ..... दुल्हन कह कर बुलाने वाली को जब मैंने नज़र उठा कर देखा तब गोरी सी  दरम्याने कद की  गहरे हरे रंग का चुड़ीदार suit पहने रहिमन काकी मुझे ससुराल के सब जनों से अलग से लगी . कुछ था जो मुझे अंदर तक भा गया था . शायद उनका दुल्हन कहने का अंदाज़ या उनकी नफासत भरी बोली  या आँखों से सराहती  एक सुरक्षा कवच सी   माँ जैसे उपस्तिथि . बस एक अनजाना सा रिश्ता सा जुड़ गया उनसे .जब भी उनको देखा  होंठो से बरबस सलाम निकल गया . उनका वोह   अरे चाँद से बेटो की माँ बनोगी दुल्हन  .ऐसा आशीर्वाद आज भी याद आता हैं और अपने बेटो को देख उनकी दुआ कुबूल हुए सी लगती हैं .
                                                         अब रहिमन काकी हर वक़्त काटने को डोडती   हैं  किसी का कोई ही लफ्ज़ उनको आगबबूला करने को काफी होता हैं काकी झोपडी ख़ाली हैं क्या?किराये पर दे दो ,? कब जा रही हो गुजरात ?
वोह झोपडी  जो कभी ताजमहल थी उनका, उनके सपनो का, जहा वह वोह रहीम चाचा के साथ रहती थी .आज वीरान हैं ....वह अब कोई झाड़ू नही लगता अब वह खाना नही पकता 
 बस काकी एक दिया जलाती हैं वहा .रोजाना शाम को .............आस का दिया ...............रहीम चाचा कह गये थे कि गुजरात  से जल्दी लौट कर आऊँगा   वहा ज्यादा काम मिलता हैं कारीगरों को ..............................जाने कितने बरस बीत गये .................. उम्मीद का दिया आज भी जलता हैं ............ और आज भी इंतज़ार करता हैं रहिमन काकी के मन का एक कोना ..

19 टिप्‍पणियां:

Mukesh Kumar Sinha ने कहा…

:( itna bhaw kahan se le aaye...
kash aas ka diya bujhne me badle ek dum se fafak ke jal uthe... rahim kaka fir se laut aayen...

Neelima sharrma ने कहा…

shukriya mukesh sinha jee.

रश्मि प्रभा... ने कहा…

नाम से गुम रहिमन की पहचान में डूबी काकी... चीखती है या पागल सी दिखती खुद से नाराज़ है ... यानि अपने विश्वास की पहचान पर

Neelima sharrma ने कहा…

Thank u so much Rashmi jee .............

Neelam ने कहा…

Neelima bhaavuk kar gayi tumhare shabdo'n ki abhivyakti..
Kaki ka intzaar jald khatam ho ,Rahim chaacha lout aaye'... kaaki aaj bhi unke intzaar me apne man ka ek kona chhipaaye baithi hain ..

Neelima ने कहा…

Thank u so much Neelu

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

रहिमन काकी के मन की आस और रहीम काका का इंतज़ार .... बहुत भाव प्रधान लिखा है ....

मेरे ब्लॉग पर आने का शुक्रिया ....

Meenakshi Mishra Tiwari ने कहा…

rula diya yaar..... sachchi ....
bhawnaon ko kya ukera hai... aankhen aur dil dono bhar aaye neelima ji....

hats off!!

Neelima sharrma ने कहा…

Thank u Meenakshi

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

आपकी किसी नयी -पुरानी पोस्ट की हल चल बृहस्पतिवार 11-10 -2012 को यहाँ भी है

.... आज की नयी पुरानी हलचल में ....शाम है धुआँ धुआँ और गूंगा चाँद । .

प्रतिभा सक्सेना ने कहा…

कितना विवश जीवन है रहिमन काकी का !

धीरेन्द्र अस्थाना ने कहा…

एक अवस्था जिसके पास सिवाय सन्नाटे के कुछ भी नही होता!
बेहतरीन कथानक !

Reena Maurya ने कहा…

भावपूर्ण कहानी....

वन्दना ने कहा…

मन भीग गया ………बेहद भावप्रवण ………उसके इंतज़ार को कोई क्या समझेगा

***Punam*** ने कहा…

भावपूर्ण...!
इंतज़ार का दर्द..!

Minakshi Pant ने कहा…

बहुत खूबसूरत भावनाओं से ओत - प्रोत आपकी रचना पढकर हम भावविभोर हो गए बहुत बेहद खूबसूरती से हर बात को रखा है |

Neelima sharrma ने कहा…

Thank you so much Meenakshi pant jee

Neelima sharrma ने कहा…

Dheerendra jee bahut bahut shukriya
Reena morya .............Aabhar aapka
Vandana ................... shukriyaa aapka
Pratibha jee ...... dhanyawad
bahut achcha laga aap sabko apne blog par dekhkar or is sab ka shrey jata hain sangeeta jee ko.................aapko bahut bahut dhaaanywad

vibha rani Shrivastava ने कहा…

मंगलवार 28/05/2013 को आपकी यह बेहतरीन पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं ....
आपके सुझावों का स्वागत है ....
धन्यवाद !!