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24 जुलाई 2014

ख़त

धौंकनी सी चलती थी मेरी साँसे जब डाकिया तुम्हारा ख़त मेरे हाथो में थमाता था और दरवाज़े की ओट में जाकर मैं ख़त पढ़ा करती थी एक बार दो बार तीन बार ..........नही बार बार लफ्ज़ -दर लफ्ज़ याद हो जाता ख़त फिर भी आँखे ख़त के लफ्जों पर घुमती रहती थी  अब तो कोई ख़त भी नही लिखता  
, आज माँ का फ़ोन आया कि पहले का ज़माना अच्छा था ख़त तो आते थे तुम सबके, अब तो तुम कॉल करती हो किसी का मन करता हैं या याद रहता तो बता दिया जाता हैं वरना मैं तड़पती रहती हूँ ना जाने कैसी हो तुम ? अब न मुझे नंबर याद रहते न सेल फ़ोन से कॉल करनाआता हैं .....मन भीग उठा . सो बेटे से कहा चलो नानी को आज एक ऐसा ख़त लिखो कि उनका मन खुश हो जाए ...जानते हो उसने क्या लिखा ........." बड़ी माँ ---- आपके हाथ के आलू के पराठे खाने का मन कर रहा हैं , कब आऊ ? चलो इसी सन्डे आ ही जाता हूँ ,बाय " उफ्फ्फ्फफ्फ्फ़ 
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