योगदान देने वाला व्यक्ति

12 मार्च 2014

मेरी तुलना

"आज फिर वही आलू मटर बोर हो गया मैं ऐसी सब्जियों से "
" कभी पिज़्ज़ा भी बनाया आपने कभी पास्ता बनाओ , शर्म आती हैं सब बच्चो के सामने आपना लंच बॉक्स खोलते , जब देखो पराठे और सब्जी .शामक की माँ हमेशा नयी नयी सब्जिया बनती हैं रोजाना उसका लंच बॉक्स नए व्यंजन से भरा होता हैं " 
जाओ आज मैं स्कूल नही ले जाऊँगा कुछ 
और शाश्वत की ऐसी बेरुखी तोड़ गयी सुधा को भीतर तलक 
माँ है ना " गृहशोभा ' से देखकर उसने आज पास्ता बना ही लिया लंच में और जब बेटे के सामने परोसा तो उसकी चमकती आँखे देख कर मन बाग बाग हो उठा
"बेटा आज रिपोर्ट कार्ड मिला होगा दिखाओ तो "
लो माँ पर अब शुरू मत हो जाना की बाकी बच्चो के नम्बर कितने आये , मैं मैं हूँ किसी से मेरी तुलना नाकिया करो , हर कोई पढाई में एक्सपर्ट नही होता ना "
सुधा अवाक् थी मन कह उठा था चुप

जुबान से " बेटा हर माँ भी तो विदेशी खाने बनाने में एक्सपर्ट नही होती "

27 फ़रवरी 2014

( कुछ पन्ने )

लघु कथा
( कुछ पन्ने )
कोई पंगे मत लेना मुझसे ! कह दिया बस , लोग समझते क्या हैं खुद को जब देखो टोकते हैं लड़की हूँ तो क्या हुआ , अपने बाप के घर का खाती हूँ , नही करनी मुझे शादी अभी , कल मेरे माँ-बाप बीमार होंगे तो कौन आएगा रोटी देने ? मेरा पति भी कह देगा तेरे बाप के लिय कमाता हूँ क्या ? मुझे अपने पैरो पर खडा होना हैं फिर सोचेंगे शादी का , आजाते हैं समाज के ठेकेदार बनके , ऐसे रिश्ते ले आते जिनका मेरे साथ कोई मैच ही नही ...मुझे बस पढना हैं ...शांत रे मन शांत !! यह वक़्त भी गुजार ले .
ऋचा ने डायरी में सब लिखा और चल दी चाय बनाने नीना मासी के लिय ..... बाहर नीना मासी लड़के के गुण बता रही थी
२२ हजार कमाता हैं कॉल सेंटर में
अब गुस्सा कही तो निकलना था ना

नीलिमा शर्मा निविया 

अरे तू भी !!!

"अबे इतनी मत अकड आखिर हैं तो लड़की ही ना ! "
"तो तू लड़का हैं तो क्या कुछ भी कह सकता ?"
"ज्यादा मत बोल थप्पड़ भी लगा दूंगा !"
"इसलिय अपने साथ लाया था क्या !!"
"तुम चुप रहा करो जो मैं कहू किया करो "
"क्यों मेरी भी कोई मर्ज़ी हैं की नही "
"ज्यादा बोलती हैं साली ! जब देखो बकर बकर "
उह्ह्हू हुह्ह्हू
"जा ओ अब मुझे तो बात ही नही करनी मेरी तो किस्मत ही ख़राब "
हा हा हा हा !
"तू तो मेरी मम्मी की तरह बाते कर रही ,"
हा हा हा हा
अरे हा हा हा हा
"तू भी तो मेरे पापा की तरह लड़ रहा हैं "

फिर दोनों की एक साथ हंसने की आवाज़ से पार्क गुलजार हो उठा
 —

24 फ़रवरी 2014

पुराने ख़त

"सुन  बिटिया , समय से गर्म कपड़ो को धूप दिखा देना, कुँवरजी को बादाम जरुर भिगोकर देना आदमी लोग खुद कुछ नही मांगते खाने को , मैं ठीक हूँ फ़िक्र ना करना बस रात को जरा घुटने दर्द करते हैं और हाँ ख़त का जवाब जरुर देना एक आस लगी रहती हैं डाकिये के आने पर . आज फ़ोन आया हैं कि माँ बहुत बीमार हैं और उसने मना किया हैं बिटिया को सूचना देने के लिए कि नाहक परेशान करोगे उसको .खुश रहने दो .........जाने की तैयारी करते हुए पुराने संदूक से उनके लिखे ख़त मिले हैं और पढ़ रही हूँ एक एक ख़त जिनको मैंने पहले कभी सही से पढ़ा भी नही और माँ ने कितनी शिद्दत से चाहा होगा उनका जवाब "कब से तेरी चिठ्ठी नही आई कम से कम कुशल मंगल का ख़त तो लिख दिया कर , मुझे फ़िक्र लगी रहती हैं तेरे हरदम " माँ ने मीठे उलाहने देते हुए फ़ोन पर कहा था एक बार तो हंस पढ़ी थी निम्मी " माँ जब मेरा ख़त ना आये तो समझ लेना मैं बहुत खुश हूँ , मुझे फुर्सत ही कहाँ हैं तुमको याद करने की , जब उदास होती हूँ तब ही ख़त लिखना याद आता हैं " कहने हुए निम्मी फिर से खिलखिला दी थी .और आज फफक फफक कर रो दी रिश्तो को भी सहेजा जा सकता हैं पुराने खतो की तरह पर उसने तो फ़ोन -ईमेल की तरह फौरीतौर पर लिया 

हमेंशा , सच हैं हाथ से लिखे हुए लफ्ज़ संवेदनाओ से जुड़े होते हैं

आक्रोश

लघु कथा 

कोई पंगे मत लेना मुझसे ! कह दिया बस , लोग समझते क्या हैं खुद को जब देखो टोकते हैं लड़की हूँ तो क्या हुआ , अपने बाप के घर का खाती हूँ , नही करनी मुझे शादी अभी , कल मेरे माँ-बाप बीमार होंगे तो कौन आएगा रोटी देने ? मेरा पति भी कह देगा तेरे बाप के लिय कमाता हूँ क्या ? मुझे अपने पैरो पर खडा होना हैं फिर सोचेंगे शादी का , आजाते हैं समाज के ठेकेदार बनके , ऐसे रिश्ते ले आते जिनका मेरे साथ कोई मैच ही नही ...मुझे बस पढना हैं ...शांत रे मन शांत !! यह वक़्त भी गुजार ले .
ऋचा ने डायरी में सब लिखा और चल दी चाय बनाने नीना मासी के लिय ..... बाहर नीना मासी लड़के के गुण बता रही थी
२२ हजार कमाता हैं कॉल सेंटर में
अब गुस्सा कही तो निकलना था ना

नीलिमा शर्मा निविया 

14 फ़रवरी 2014

"दफा हो ! मरजाना



"दफा हो ! मरजाना 
जब देखो शराब पीकर किसी के भी घर में घुसा चला आता हैं " "ओये मेमसाहेब अपने साहब को ले जाओ यहाँ से " जोर से आती आवाज़ को सुनकर नंदनी घर से बाहर की तरफ दौड़ी सामने अनिरुद्ध नशे में धुत्त जमीन पर बैठा था , हाथ का सहारा देकर उसको घर लायी और सामने फोल्डिंग पलंग पर लिटाया अनिरुद्ध के मुह से नशे में धाराप्रवाह माँ - बहन की गालियाँ निकल रही थी . नंदनी की आँखे भर आई उसका यह हाल देखकर , माँ बाप का एकलोता बेटा जिसकी खूबसूरती पर उसकी सहेलिया भी रीझ उठी थी आज इस हालत में था माता पिता की मृत्यु के बाद सारा पैसा उसके हाथ में आगया था अच्छी भली बैंक की नौकरी छोड़ कर उसने अपना बिज़नस शुरू करने की सोची अनुभव की कमी दीखावे की प्रवृति और बुरी संगत ... आज घर में खाने को भी कुछ ना था वोह सुधारना चाहता था परन्तु आदते कहाँ जल्द्दी से पीछा छोडती हैं और नंदनी भी किस मुह से माता पिता के घर जाए घर से भाग कर उसने अनिरूद्ध से ब्याह किया था . कुछ तो करना होगा सोचते सोचते उसने एक निश्चय किया घर को ताला लगाकर उसने अखबार की कतरन हाथ में ली और चल पढ़ी नशा मुक्ति केंद्र ...

9 जनवरी 2014

कॉलर ऑय दी वाला फ़ोन

आज फिर सर्द हवाए चल रही हैं कपडे धुप में सुखाने के लिय बाल्टी उठायी ही थी कि लैंडलाइन 

फ़ोन की घंटी बजी . लैंडलाइन की घंटी बजना यानी किसी अपने का फ़ोन ही होगा आज कल इस नंबर 

को कौन याद रखता हैं सब अपने अपने सेल में एक नंबर फीड कर लेते हैं और उस पर नाम चस्पा कर

देते हैं फलां का नंबर .और अगर कभी सेल फ़ोन बीमार पढ़ जाए तो वोह नंबर भी बीमार पढ़ जाता हैं 

जिसे पाने के लिय जान पहचान वालो के नंबर मिलाने पढ़ते हैं जो संयोग से याद रह जाए .घंटी एक बार

बंद होकर दुबारा बजनी शुरू हुयी .पक्का कोई अपना ही हैं बेसब्र बेताब सा ...... गीले कपड़ो के साथ 

भीतर जाना पडेगा सोचती हुयी मनीषा ने शाल उठाया और भीतर कमरे में चली गयी और जैसे ही 

उसने फ़ोन उठाया फ़ोन बंद हो गया गुस्से से चुपचाप लाल फ़ोन को घूरती रही कि कौन होगा फिर से फ़ोन 
की घंटी बजी उसने एक दम से फ़ोन उठाया और हेल्लो कहा .
एक ख़ामोशी सी थी दूसरी तरफ उफ्फ्फ्फ़ . हेल्लो हेल्लो बार बार कहने पर भी उधर से कोई आवाज़ नही 
आई ..मनीषा सोचने लगी क्या पता उनकी आवाज़ नही आ रही हो मुझ तक मेरी तो जा रही होगी न ..

. तो एक दम से बोली सु निये आप जो भी हैं मुझे आपकी आवाज़ नही आरही हैं अगर आपको मेरी 

आवाज़ आ रही हैं तो या तो फिर से कॉल मिलाये या मेरे सेल फ़ोन पर कॉल करे ...कहकर मनीषा ने 

फ़ोन रख दिया और इंतज़ार करने लगी क्या पता फिर बजे फ़ोन ...... पर .फ़ोन नही बजा  

फ़ोन के पहली बार खाली बजने और उसके दुबारा 

बजने के बीच के समय में घर की सूनी दीवारे भी बात करने लगती हैं और कल्पनाये होने लगती हैं कि 

उसका फ़ोन होगा इसका फ़ोन होगा .पता नही क्या बात होगी जो लैंडलाइन पर फ़ोन आया यह नंबर तो 

सिर्फ फलाने फलाने के पास हैं .उफ़ नही आ रहा कोई फ़ोन वोन .सोचते ही मनीषा ने बाहर आकर बाल्टी 


और कपडे सुखाने चल दी .............कौन हो सकता हैं हर गीले कपडे को झटकते हुए उसका मन एक 

नाम लेता और उसे झटक भी देता कि नही .. उसका नही हो सकता आजकल घंटिया कुछ ज्यादा ही बजने 

लगी हैं कही किसी बीमा पालिसी वाले एजेंट का ही नंबर न हो 

सुनहरी धुप धीरे धीरे सुरमई शाम में तब्दील हो गयी ..... रसोई 
में सब्जी बनती मनीषा गीत गुनगुना रही थी कि फिर से घंटिया बजने लगी तो उसने उसने झट से आंच 

धीमी की और कमरे में जाकर खिन्न होकर फ़ोन उठाया और थोड़े रुड स्वर में हेल्लो कहा . उधर से सिर्फ 

सांसे सुनाई दी उसका गुस्सा और बढ़ गया ........ "

"देखिये !!! आप जो भी हैं बात करिए या कॉल मत करिए" .......


"हेल्लो हेल्लो " .....
"" देखिये अब अगर फ़ोन किया तो मैं पुलिस में शिकायत कर दूँगी ."

कहते ही जैसे ही उसने फ़ोन रखना चाहा उसको एक आवाज़ सुनाई दी ".मणि .................. 
और हाथ से उसके रिसीवर गिर गया 
मणि!!!! यह नाम तो मुझे ......
.... उफ़ मेरा नंबर उसको कहाँ से मिला
हाँ सांसे भी वही थी गहरी सी 

कभी जिन सांसो से वोह पहचान जाती थी किसका फ़ोन हैं 

जिसके फ़ोन करने के तरीके से वोह घंटियों की भाषा पढ़ लेती थी 
मिस्ड कॉल की एक घंटी तो मिस्सिंग यू 
दो घंटी तो लव यू 
तीन घंटी तो कॉल मी
और आज भूल गयी उन सांसो की थिरकन को 
उधर से मणि मणि की आवाज़ के साथ हेल्लो हेल्लो सुनाई दिया तो उसने झट से रिसीवर उठाया ............ देखिये यहाँ कोई मणि नही रहती आजके बाद यहाँ कॉल न किया करे ......... कहकर फ़ोन रख दिया  
और इधर उधर देखते हुए अपनी धडकनों को सम्हालने की असफल कोशिश करने लगी .उसे मंगवाना ही

पड़ेगा अब तो कॉलर ऑय दी वाला फ़ोन


नीलिमा शर्मा